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Wednesday, 28 July 2021

काकतीय रूद्रेश्वर मंदिर : यूनेस्को की विश्व धरोहर में सम्मिलित

तेलंगाना के वारंगल में स्थित काकतीय रूद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर को अब विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर लिया गया है।

https://youtu.be/bcIhE84XMZMतेलंगाना के वारंगल में स्थित काकतीय रूद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर को अब विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर लिया गया है। एक तारे के आकार का यह प्राचीन मंदिर स्थापत्य कला का शानदार नमूना है। चीन में यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 44वें सत्र में इसे विरासत स्थल के रूप में अंकित किया। नॉर्वे को छोड़कर 22 सदस्यों ने भारत के इस विरासत के पक्ष में राय दी। काकतीय रूद्रेश्वर मंदिर को सूचिबद्ध किए जाने के बाद अब भारत के 39 स्थल विश्व विरासत में शामिल कर लिए गए हैं।
रूद्रेश्वर मंदिर का निर्माण काकतीय राजा रूद्रदेव ने 12वीं शताब्दी में करवाया था। इस मंदिर में एक हजार स्तंभ हैं। इसलिए इसे हजार स्तंभों वाला मंदिर भी कहते हैं। इसके निर्माण में जिन पत्थरों का उपयोग हुआ है वह पानी में भी नहीं डूबते। यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह अकेला ऐसा मंदिर है जो एक तारे के आकार का है। खास बात यह है कि यहां एक ही छत के नीचे भगवान शिव और विष्णु के साथ सूर्य देव की मूर्ति है। इसलिए इसे त्रिकुटल्यम भी कहते हैं। आमतौर पर भगवान शिव और विष्णु के साथ ब्रह्मा की प्रतिमा होती है।
रूद्रेश्वर मंदिर वारंगल की हनमकोंडा पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर के मुख्य दरवाजे पर भगवान शिव के प्रिय नंदी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। इसे काले पत्थर को तराश कर बनाया गया है। मंदिर में स्तंभों पर बहुत ही बारीक वास्तुकला है। इसमें सुई से भी बारीक छेद हैं। खास बात यह है की इस मंदिर में विराजमान देवों को मंदिर के किसी भी कोने से देखने पर कोई स्तंभ बीच में नहीं आता है। मंदिर के निर्माण में 72 साल लगे। इसमें पांच फुट ऊंची भगवान गणेश की भी एक प्रतिमा है। इसकी नींव में बालू भरी हुई है, जो इसके भूकंपरोधी होने का प्रमाण है। इसे ‘सैंडबॉक्स’ तकनीक कहा जाता है।https://youtu.be/bcIhE84XMZM
इस मंदिर के निर्माण के दौरान बेहतर नक्काशी और उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। इस मंदिर का प्रभावशाली प्रवेशद्वार, हजार विशाल खंभे और छतों के शिलालेख आकर्षण केंद्र हैं।
वारंगल स्थित यह शिव मंदिर एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसका नाम इसके शिल्पकार रामप्पा के नाम पर रखा गया। काकतीय वंश के राजा रूद्र देव ने वर्ष 1163 में करवाया था। खास बात यह है कि इस दौर में बने ज्यादातर मंदिर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन कई प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी इस मंदिर को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा है। यह शोध का विषय भी रहा है। यह दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है।

यूनेस्को विश्व विरासत स्थल ऐसे विशेष स्थानों (जैसे वन क्षेत्र, पर्वत, झील, मरुस्थल, स्मारक, भवन, या शहर इत्यादि) को कहा जाता है, जो विश्व विरासत स्थल समिति द्वारा चयनित होते हैं। यही समिति इन स्थलों की देखरेख यूनेस्को के तत्वावधान में करती है। इसका उद्देश्य विश्व के ऐसे स्थलों को चयनित एवं संरक्षित करना होता है, जो विश्व संस्कृति की दृष्टि से मानवता के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

कुछ खास परिस्थितियों में ऐसे स्थलों को इस समिति द्वारा आर्थिक सहायता भी दी जाती है। प्रत्येक विरासत स्थल उस देश विशेष की संपत्ति होती है, जिस देश में वह स्थल स्थित है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का हित भी इसी में होता है कि वे आनेवाली पीढ़ियों के लिए और मानवता के हित के लिए संरक्षण करें।

भारत की धरोहरhttps://youtu.be/bcIhE84XMZM

भारत के 38 यूनेस्को विरासत स्थलों में से 31 सांस्कृतिक धरोहर हैं। सात 7 प्राकृतिक धरोहर हैं और एक मिश्रित धरोहर है। यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की संभावित सूची में अब भारत के 48 स्थान शामिल हैं। साल 2020 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर और ओरछा शहरों को यूनेस्को के विश्व धरोहर शहरों की सूची में शामिल किया गया था। विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाने वाला प्रमुख प्राकृतिक धरोहर काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान है। इसे 1985 में विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित किया गया। अन्य एक प्रमुख उद्यान मानस वन्यजीव अभयारण्य को जून 2011 में सूची में शामिल किया गया।

Friday, 23 July 2021

ब्रिटेन में मिला 460 करोड़ साल से छिपा ‘खजाना’, पृथ्वी से भी पुराना, खोल सकता है जीवन के राज

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों के हाथ करोड़ों साल पुराना 'खजाना' लगा है. वैज्ञानिकों को करीब 460 करोड़ साल पुराना उल्कापिंड मिला है. यह पत्थर का टुकड़ा धरती से भी पुराना है. धरती की उम्र लगभग 454 करोड़ साल है. यह पत्थर पृथ्वी की उत्पत्ति के कई राज खोल सकता है.

अंतरिक्ष से आए इस उल्कापिंड को सबसे पुराना पत्थर बताया जा रहा है. करीब 300 ग्राम का यह पत्थर इंग्लैंड के ग्लोस्टशायर के एक गांव के पास मिला है. ईस्ट एंग्लियन एस्ट्रोफिजिकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (EAARO) में एस्ट्रोकेमिसिट्री के प्रोफेसर डेरेक रॉबसन ने इसे खोजा है. इस साल फरवरी के अंत में वह अपनी टीम के साथ उल्कापिंड के टुकड़ों की तलाश में निकले थे. EAARO
डेरेक रॉबसन और उनकी टीम लैब में इस उल्कापिंड के बारे में अध्ययन करने में लगी हैं. माना जा रहा है कि यह उल्कापिंड 17.7 करोड़ किलोमीटर का सफर तय करके धरती पर आया है और इसका असली घर मंगल या जूपिटर हो सकता है. मगर विशेषज्ञों की दिलचस्पी इसके सफर से ज्यादा इसकी उम्र को लेकर है. माना जा रहा है कि यह उल्कापिंड हमारे सौरमंडल के निर्माण से भी पहले का है. 

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस पत्थर से धरती पर जीवन की उत्पत्ति के कई राज खुल सकते हैं. EAARO ने बयान में कहा कि ऐसा लग रहा है कि यह थर्मल मेटाफोरफिजम से नहीं गुजरा है और लंबे समय से यहीं पर है. मंगल या किसी अन्य ग्रह के निर्माण से भी पहले से यह अनछुआ यहां पड़ा हुआ है.
इससे पहले वैज्ञानिकों को मार्च में भी इतना ही पुराना उल्कापिंड मिला था. यह उल्कापिंड पिछले साल सहारा के रेगिस्तान में मिला था. इस पत्थर को EC002 नाम दिया गया था.
फ्रांस और जापान के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पत्थर कभी तरल लावा था, लेकिन बाद में ठंडा होकर यह ठोस हो गया. करीब एक लाख साल में यह तरल से ठोस बनकर करीब 31 किलो का पत्थर बन गया
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इस तरह के तत्वों वाला उल्कापिंड आज तक नहीं मिला है क्योंकि या तो वे बहुत विशाल रूप ले लेते थे या फिर नष्ट हो जाते थे. 
इस उल्कापिंड में कई तरह के मिनरल्स और तत्व मौजूद हैं. इस उल्कापिंड का बड़ा हिस्सा ओलिविन और फाइलोसिलिकेट्स जैसे खनिजों से मिलकर बना हुआ है.