Tuesday, 30 June 2020
Friday, 5 June 2020
सूर्य देव मंदिर का महत्व
भारत में सूर्य देव की उपासना ऋग वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना का उल्लेख विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से है। उत्तर वैदिक काल के अन्तिम कालखण्ड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने के बाद कालान्तर में सूर्य की मूर्ति पूजा का प्रचलन हो गया और अनेक स्थानों पर सूर्यदेव के मन्दिर बनाये गये। कश्मीर के दक्षिणी भाग में श्रीनगर से 60 किलोमीटर दूर अनंतनाग से पहलगाम के रास्ते में मार्तण्ड सूर्य मन्दिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में कर्कोटक वंश के राजा ललितादित्य मुक्तापीड ने करवाया था। मन्दिर के स्तम्भों की वास्तु-शैली रोम की डोरिक शैली से मिलती-जुलती है। बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि में इस मन्दिर को बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है। वर्तमान में यह मन्दिर खंडहरों में तब्दील हो चुका है पर आज भी सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। यह कश्मीरी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है, जिसमें चीनी, रोमन, ग्रीक और भारतीय शैली की झलक दिखती है। दक्षिण कश्मीर के मार्तण्ड के प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर के प्रतिरूप का सूर्य मन्दिर जम्मू में भी बनाया गया है। आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में अरसावल्ली गाँव में प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर का निर्माण कलिंग राजवंश के राजा देवेन्द्र वर्मा ने 7वीं सदी में करवाया था। दक्षिण भारतीय और कलिंग स्थापत्य शैली का यह मन्दिर दक्षिण भारत में एकमात्र सूर्य मन्दिर है। मन्दिर का निर्माण इस तरह किया गया है कि वर्ष में दो बार (मार्च और अक्टूबर) मे प्रातः काल सूर्य की सुनहरी किरणे भगवान सूर्य की मूर्ति के चरणो में पड़े। सूर्य की किरणें मन्दिर के 5 मुख्य द्वारो से होकर काले ग्रेनाइट से बने सूर्यदेव के चरणो तक पहुंचती हैं। सूर्य देव को त्रिमूर्ति -ब्रह्मा,विष्णु और महेश तीनो ही का स्वरुप माना जाता है, इसी लिये इस मन्दिर में आदित्य, अम्बिका, विष्णु, गणेश और महेश्वर की मूर्तियां स्थापित है। इस मन्दिर को श्री सूर्यनरायण स्वामी देवस्थान और हर्षवल्ली अर्थात खुशियों का घर भी कहते है। उत्तराखण्ड राज्य में अल्मोड़ा से लगभग 17 किलोमीटर दूर कटारमल में स्थित कटारमल सूर्य मन्दिर का निर्माण कत्यूरी राजवंश के शासक कटारमल के द्वारा तेरहवीं शताब्दी में हुआ था। इस सूर्य मन्दिर को "बड़ आदित्य सूर्य मन्दिर" भी कहा जाता है क्योंकि इस मन्दिर में भगवान आदित्य की मूर्ति किसी पत्थर अथवा धातु की नहीं अपितु बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। यह पूर्वाभिमुखी मन्दिर 2,116 मीटर की ऊंचाई पर त्रिरथ संरचना और वर्गाकार गर्भगृह के साथ वक्ररेखी शिखर सहित निर्मित है। एक ऊँचे वर्गाकार चबूतरे पर सूर्यदेव को समर्पित मुख्य मन्दिर के आस-पास 45 छोटे-बड़े मन्दिरों का समूह भी है। मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार बेजोड़ काष्ठ कला द्वारा उत्कीर्ण था, जो कुछ अन्य अवशेषों के साथ वर्तमान में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित है। राजस्थान के झालावाड़ जिले में झालरापाटन के सूर्य मन्दिर का निर्माण नाग भट्ट द्वितीय ने 9वीं सदी में करवाया था। रथ शैली में बने इस मन्दिर के गर्भगृह में चतुर्भज नारायण की मूर्ति प्रतिष्ठित हैं। पुराणों में सूर्य की उपासना चतुर्भुज नारायण के रूप में भी की गई हैं। इस मन्दिर को पद्मनाभ मन्दिर, बड़ा मन्दिर, सात सहेलियों के मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। ओडिशा राज्य मे पुरी के निकट कोणार्क सूर्य मन्दिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने 13वीं शताब्दी में करवाया था। रथ के आकार में बनाया गया यह मन्दिर भारत की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा उदाहरण है। यहां रथ के आकार में बना एक भव्य भवन है; मन्दिर के दोनों और 12 पहियों की दो कतारों में इसके 24 पहिए एक दिन में 24 घण्टों का प्रतीक है और रथ खींच रहे सात अश्व सप्ताह के सात दिन दर्शाते हैं। यहां की सूर्य प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में सुरक्षित रखी गई है और अब यहां कोई देव मूर्ति नहीं है। इसमें काले रंग के ग्रेनाइट पत्यर का प्रयोग होने के कारण इसे "ब्लैक पगोडा" भी कहते है। इस मन्दिर को यूनेस्को द्वारा वर्ष 1984 में विश्व विरासत घोषित किया गया है। गुजरात के मेहसाणा जिले में पुष्पावती नदी के किनारे स्थित मोढेरा सूर्य मन्दिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। भारत के मध्य से गुजरती कर्क रेखा के ऊपर स्थापित इस मन्दिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूरे मन्दिर के निर्माण में जुड़ाई के लिए कहीं भी चूने का उपयोग नहीं किया गया है। ईरानी शैली में निर्मित इस मन्दिर को दो हिस्सों - गर्भगृह और सभामंडप में बनाया गया है। मोढेरा सूर्य मन्दिर के अष्टभुजीय सभामंडप में एक सौर वर्ष के 52 सप्ताहों को दर्शाते 52 स्तम्भ हैं। इन स्तम्भों पर विभिन्न देवी-देवताओं के चित्रों के अलावा रामायण और महाभारत के प्रसंगों को बेहतरीन कारीगरी के साथ दिखाया गया है। वर्तमान में इस मन्दिर के भीतर किसी भी देवी अथवा देवता की प्रतिमा उपस्थित नहीं है।
मंजूषा क्या है?
क्या है मंजूषा कला? : वरिष्ठ कला समीक्षक सुमन सिंह कहते हैं कि मंजूषा यानी पिटारे पर बनायी जाने वाली कला ही मंजूषा कला कही जाती है. इसमें बिहुला-विषहरी की लोककथा के प्रसंग दर्शाये जाते हैं. इस चित्रशैली में सिर्फ हरा, पीला आैर लाल रंग का प्रयोग होता है. आमतौर पर आकृति के रेखांकन में सिर्फ हरे रंग का प्रयोग किया जाता है.
वहीं पीला, हरा आैर लाल रंग से रेखाओं की बीच की जगह को भरा जाता है. मंजूषा चित्रकला को स्थानीय अंचल से बाहर की दुनिया को परिचित कराने का श्रेय 1941 में भागलपुर में पदस्थापित रहे आइसीएस अधिकारी व कला मर्मज्ञ डब्ल्यूसी आर्चर को जाता है. जिन्होंने स्थानीय मालाकार व कुंभकारों द्वारा बरती जाने वाली इस कला की कुछ कृतियों को लंदन स्थित इंडिया हाउस में प्रदर्शित किया. तब जाकर दुनिया सदियों पुरानी इस लोक परंपरा से जुड़ी मंजूषा चित्रकला से परिचित हो पायी.मध्य वैदिक काल के सोलह जनपदों में से एक चंपानगर वर्तमान भागलपुर, बिहार का एक कस्बा है। माना जाता है कि अपने उत्कर्ष काल में यह व्यापार का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। यहां के व्यापारी अपने व्यापार के लिए गंगा के जलमार्ग का इस्तेमाल करते थे। मान्यता है कि एक बार भगवान शिव जब नदी में स्नान कर रहे थे तब उनकी जटा से पांच केश टूट कर नदी में जा गिरे। इन पांच टूटे केश से मैना,विषहरी, अदिति, जया आैर पद्मा नामक पांच सर्प कन्याएं उत्पन्न हुर्इं। अब इस तरह से उत्पन्न भगवान शिव की इन पांच मानस पुत्रियों के समूह को मनसा नाम से जाना गया। लेकिन शिव की इन मानस पुत्रियों का मलाल यह था कि अन्य देवी देवताओं की तरह उनकी पूजा अर्चना संसार में नहीं हो रही थी। उन्होंने अपनी यह व्यथा भगवान शिव से बताई, भगवान ने कहा कि पृथ्वी पर चंपानगर में चन्द्रधर नामक मेरा परम भक्त निवास करता है। तुम उससे कहो कि वह तुम्हारी पूजा करे, अगर वह यह स्वीकार कर लेता है तो पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा होने लगेगी। शिव की बात मानकर उन पांचो ने अपना संदेशा चन्द्रधर उर्फ चांद सौदागर तक पहुंचाया किन्तु उसने यह कहकर इंकार कर दिया कि जिन हाथों से मैं भगवान शिव की आराधना करता हूं उन्हीं हाथों से तुम्हारी यानी सर्पिणियों की पूजा मेरे लिए संभव नहीं है। इस उत्तर से क्रोधित होकर देवी मनसा ने उसके छ: पुत्रों को डसकर मार डाला। किन्तु इसके बाद भी चांद सौदागर पूजा ना देने की अपनी जिद पर अड़ा रहा। अब बारी थी उसके सातवें पुत्र लखिन्दर की प्राण रक्षा कि जिसकी शादी बिहुला नामक युवती से होना तय किया गया था। इधर मनसा की धमकी थी कि हर हाल में सुहागरात को ही वह इस सातवें पुत्र को भी अपने सर्पदंश से मौत के घाट उतार देगी। सौदागर ने पुत्र की प्राण रक्षा के लिए लोहे के एक ऐसे भवन बनाने की तैयारी शुरू करवा दी जिसकी दीवारों में कहीं कोई छेद की गुंजाइश ना रहे, ताकि किसी भी हाल में सर्प का प्रवेश उस कक्ष में ना हो सके जो उन नवदंपतियों के सुहागकक्ष के तौर पर तैयार किया गया था। किन्तु मनसा ने इस कार्य से जुड़े कारीगर को डरा कर उससे एक छोटा सा छिद्र उस कक्ष की दीवार में बनवा लिया। उधर बिहुला को अपने पति पर आने वाले इस आसन्न संकट से अवगत करा दिया गया था। पति की प्राण रक्षा के निमित बिहुला लगातार जगकर निगरानी करने लगी, किन्तु दैवयोग से जब पौ फटने से कुछ देर पहले उसे एक झपकी सी आई, इसी बीच देवी मनसा द्वारा भेजे गए सर्प ने लखिन्दर को अपने विषदंश का शिकार बना लिया। चंपानगर के सुप्रसिद्ध वैद्य धनोतर गुरू आैर मांत्रिक केशो झारखंडी जैसे लोगों का उपचार भी किसी काम नहीं आया आैर बिहुला अपने सुहागरात को ही विधवा हो गई।
अपने मृत पति के साथ सती होने की प्रथा के विपरीत बिहुला ने कुछ अलग करने का निर्णय लिया। उसने फैसला किया कि वह अपने मृत पति के देह को लेकर स्वर्ग जाएगी आैर अपनी तपस्या से उसे पुर्नजीवन प्रदान कराएगी। इसके लिए उसने अपने ससुर से अनुरोध किया कि एक बेड़े पर उसको अपने पति के मृत देह के साथ बिठाकर गंगा में विसर्जित कर दिया जाए ताकि इस मार्ग से वह स्वर्ग तक पहूंच सके। बिहुला के अनुरोध पर मंजूषानुमा बहुमंजिला बेड़ा तैया किया गया। जिसकी दिवारों पर लहसन माली नामक चित्रकार के द्वारा बिहुला के साथ घटी घटनाओं, चांद सौदागर, सूर्य, चन्द्रमा, हाथी, घोड़ा, चम्पक पुष्प व मनियार नाग का चित्रण कराया गया। तत्पश्चात वह गंगा नदी के रास्ते तमाम मुसीबतों व आपदाओं से दो-चार होते हुए अंतत: स्वर्गलोक को पहुंची। जहां के धोबीघाट पर उसकी मुलाकात नेतुला नामक देवताओं के धोबी से हुई। बिहुला ने उस धोबी के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया, उसके द्वारा धोए जानेवाले कपडों में एक खास तरह की सुगंध आने लगी। इस सुगंध के बारे में जब देवताओं ने जानना चाहा तो नेतुला ने बताया कि इन कपड़ों को मेरी बेटी ने धोया है। इसके बाद बिहुला को देवताओं के सम्मुख ले जाया गया जहां उसे वरदान मांगने को कहा गया। बिहुला ने देवताओं से अपने मृत पति के साथ-साथ अपने छ: जेठों के पुर्नजीवन का वरदान मांगा। इधर देवी मनसा भी बिहुला की साधना आैर पतिव्रत से प्रसन्न हो चुकी थी। अंतत: इन सबों से इच्छित वरदान पाकर बिहुला अपने पति व जेठों को साथ लेकर चंपानगर वापस आ गई। अपने सभी बेटों को वापस पाकर प्रसन्न चांद सौदागर ने बिहुला के अनुरोध पर देवी मनसा को पूजना स्वीकार कर लिया। माना जाता है कि तभी से इस अंचल में उपरोक्त तिथि को देवी मनसा की पूजा का प्रचलन चला आ रहा है।
यह परंपरा कितनी प्राचीन है इसके बारे में तो प्रामाणिक तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। इस अंचल में पुरातत्व विभाग द्वारा 1970-71 में कर्णगढ़ की खुदाई में मिले सिंधुकालीन कुछ अवशेषों के आधार पर स्थानीय लोग इस परंपरा को सिंधुघाटी काल से जोड़कर देखते हैं। वैसे इस मंजूषा चित्रकला को स्थानीय अंचल से बाहर की दुनिया को परिचित कराने का श्रेय 1941 में भागलपुर में पदस्थापित रहे आई. सी. एस. अधिकारी व कला मर्मज्ञ डब्ल्यू. सी. आर्चर को जाता है। जिन्होंने स्थानीय मालाकार व कुंभकारों द्वारा बरती जाने वाली इस कला की कुछ कृतियों को लंदन स्थित इंडिया हाउस में प्रदर्शित किया। तब जाकर दुनिया सदियों पुरानी इस लोक परंपरा से जुड़ी मंजूषा चित्रकला से परिचित हो पायी। किन्तु कतिपय कारणों से कालांतर में यह चित्रकला सिमटती सी चली जाने लगी थी। सिर्फ विशेष अवसरों पर ही इसका चित्रण मालाकार व कुंभकारों के द्वारा किया जाने लगा था। किन्तु स्थानीय नागरिकों व संस्थाओं की पहल पर चक्रवर्ती देवी, मनोज पंडित व उलूपी कुमारी जैसे कलाकारों के विशेष योगदान से आज इसे एक चित्रशैली के तौर पर पहचान मिल चुकी है। इस चित्रशैली की कुछ खास विशेषताओं में एक है इसके अंकन के लिए सिर्फ हरा, पीला आैर लाल रंग का प्रयोग। आमतौर पर आकृति के रेखांकन में सिर्फ हरे रंग का प्रयोग किया जाता है वहीं पीला, हरा आैर लाल रंग से रेखाओं की बीच की जगह को भरा जाता है। मनसा देवी यानी पांचों बहनों को सर्परूप में एक साथ चित्रित किया जाता है। चम्पा फूल, मनियार सांप, नेतुला धोबी, चांद सौदागर, लखिन्दर जैसे इस कथा से जुड़े सभी पात्रों को एक खास पहचान के साथ चित्रित किया जाता है ताकि दर्शक उसे आसानी से समझ सके। पुरूष आकृतियों के चेहरे पर शिखा व मूंछ का होना अनिवार्य समझा जाता है। हालांकि अब जब इस कला को सिर्फ मंजूषा को अलंकृत करने तक सीमित रखने के बजाय व्यावसायिक उत्पादों व सजावटी सामानों पर भी चित्रित किया जाने लगा है तब रंग संगतियों में कुछ नए प्रयोग भी सामने आने लगे हैं। साथ ही किसी जमाने में जाति विशेष तक सीमित माने जाने वाली इस कला को समाज के विभिन्न तबकों द्वारा एक कलारूप के तौर पर अपनाया जा रहा है।
दो प्रमुख नदी गंगा और यमुना
Ganga
500 AD - 600AD
गुप्त काल से उत्तर भारत की दो पवित्र नदियों, गंगा और यमुना को प्रत्येक देवी भक्त को शुद्ध करने के लिए क्रमशः कई हिंदू मंदिरों के प्रवेश द्वार पर नदी देवी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। गंगावतरण कथा में वर्णित गंगा का पृथ्वी पर अवतरण। भगवान शिव से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया था और पृथ्वी पर गंगा को लाने वाले राजा भगीरथ की घोर तपस्या से जुड़े हुए, उन्हें धरती पर लाने से पहले उनके बाल गांठ जटाओं पर रखा था। गंगा उर्वरता, अदम्य ऊर्जा और प्रचुरता का प्रतीक है। यह यहाँ एक बेज्वेल्ड, सुंदर युवा देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने वाहन (वाना) जलीय जीव पर खड़ी है जिसे मकारा या मगरमच्छ कहा जाता है। उसे ऊपरी वस्त्र पहने हुए कपड़े का एक साधारण सा हिस्सा-आंशिक रूप से स्तनों को ढँकते हुए दिखाया गया है, एक तंग स्कर्ट उसके शरीर से चिपकी हुई है और कमर पर बन्धन और पानी के बर्तन पकड़े हुए है। सुशोभित मुद्राएँ मध्यम आभूषण गुप्तविद्या सम्मेलन हैं। विशेष और सराहनीय परिशोधन लेकिन यह भी कलात्मक प्रस्तुतियों की गुणवत्ता है जो 5 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के भारतीय टेराकोटा कला के क्षेत्र में बेजोड़ हैं। अचिछत्र में स्थित शिव मंदिर में यह प्रतिमा थी। वे न केवल रचनात्मक क्षमता, तकनीकी के शिखर का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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