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Friday, 5 June 2020

मंजूषा क्या है?

क्या है मंजूषा कला? : वरिष्ठ कला समीक्षक सुमन सिंह कहते हैं कि मंजूषा यानी पिटारे पर बनायी जाने वाली कला ही मंजूषा कला कही जाती है. इसमें बिहुला-विषहरी की लोककथा के प्रसंग दर्शाये जाते हैं. इस चित्रशैली में सिर्फ हरा, पीला आैर लाल रंग का प्रयोग होता है. आमतौर पर आकृति के रेखांकन में सिर्फ हरे रंग का प्रयोग किया जाता है.
वहीं पीला, हरा आैर लाल रंग से रेखाओं की बीच की जगह को भरा जाता है. मंजूषा चित्रकला को स्थानीय अंचल से बाहर की दुनिया को परिचित कराने का श्रेय 1941 में भागलपुर में पदस्थापित रहे आइसीएस अधिकारी व कला मर्मज्ञ डब्ल्यूसी आर्चर को जाता है. जिन्होंने स्थानीय मालाकार व कुंभकारों द्वारा बरती जाने वाली इस कला की कुछ कृतियों को लंदन स्थित इंडिया हाउस में प्रदर्शित किया. तब जाकर दुनिया सदियों पुरानी इस लोक परंपरा से जुड़ी मंजूषा चित्रकला से परिचित हो पायी.मध्य वैदिक काल के सोलह जनपदों में से एक चंपानगर वर्तमान भागलपुर, बिहार का एक कस्बा है। माना जाता है कि अपने उत्कर्ष काल में यह व्यापार का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। यहां के व्यापारी अपने व्यापार के लिए गंगा के जलमार्ग का इस्तेमाल करते थे। मान्यता है कि एक बार भगवान शिव जब नदी में स्नान कर रहे थे तब उनकी जटा से पांच केश टूट कर नदी में जा गिरे। इन पांच टूटे केश से मैना,विषहरी, अदिति, जया आैर पद्मा नामक पांच सर्प कन्याएं उत्पन्न हुर्इं। अब इस तरह से उत्पन्न भगवान शिव की इन पांच मानस पुत्रियों के समूह को मनसा नाम से जाना गया। लेकिन शिव की इन मानस पुत्रियों का मलाल यह था कि अन्य देवी देवताओं की तरह उनकी पूजा अर्चना संसार में नहीं हो रही थी। उन्होंने अपनी यह व्यथा भगवान शिव से बताई, भगवान ने कहा कि पृथ्वी पर चंपानगर में चन्द्रधर नामक मेरा परम भक्त निवास करता है। तुम उससे कहो कि वह तुम्हारी पूजा करे, अगर वह यह स्वीकार कर लेता है तो पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा होने लगेगी। शिव की बात मानकर उन पांचो ने अपना संदेशा चन्द्रधर उर्फ चांद सौदागर तक पहुंचाया किन्तु उसने यह कहकर इंकार कर दिया कि जिन हाथों से मैं भगवान शिव की आराधना करता हूं उन्हीं हाथों से तुम्हारी यानी सर्पिणियों की पूजा मेरे लिए संभव नहीं है। इस उत्तर से क्रोधित होकर देवी मनसा ने उसके छ: पुत्रों को डसकर मार डाला। किन्तु इसके बाद भी चांद सौदागर पूजा ना देने की अपनी जिद पर अड़ा रहा। अब बारी थी उसके सातवें पुत्र लखिन्दर की प्राण रक्षा कि जिसकी शादी बिहुला नामक युवती से होना तय किया गया था। इधर मनसा की धमकी थी कि हर हाल में सुहागरात को ही वह इस सातवें पुत्र को भी अपने सर्पदंश से मौत के घाट उतार देगी। सौदागर ने पुत्र की प्राण रक्षा के लिए लोहे के एक ऐसे भवन बनाने की तैयारी शुरू करवा दी जिसकी दीवारों में कहीं कोई छेद की गुंजाइश ना रहे, ताकि किसी भी हाल में सर्प का प्रवेश उस कक्ष में ना हो सके जो उन नवदंपतियों के सुहागकक्ष के तौर पर तैयार किया गया था। किन्तु मनसा ने इस कार्य से जुड़े कारीगर को डरा कर उससे एक छोटा सा छिद्र उस कक्ष की दीवार में बनवा लिया। उधर बिहुला को अपने पति पर आने वाले इस आसन्न संकट से अवगत करा दिया गया था। पति की प्राण रक्षा के निमित बिहुला लगातार जगकर निगरानी करने लगी, किन्तु दैवयोग से जब पौ फटने से कुछ देर पहले उसे एक झपकी सी आई, इसी बीच देवी मनसा द्वारा भेजे गए सर्प ने लखिन्दर को अपने विषदंश का शिकार बना लिया। चंपानगर के सुप्रसिद्ध वैद्य धनोतर गुरू आैर मांत्रिक केशो झारखंडी जैसे लोगों का उपचार भी किसी काम नहीं आया आैर बिहुला अपने सुहागरात को ही विधवा हो गई।

अपने मृत पति के साथ सती होने की प्रथा के विपरीत बिहुला ने कुछ अलग करने का निर्णय लिया। उसने फैसला किया कि वह अपने मृत पति के देह को लेकर स्वर्ग जाएगी आैर अपनी तपस्या से उसे पुर्नजीवन प्रदान कराएगी। इसके लिए उसने अपने ससुर से अनुरोध किया कि एक बेड़े पर उसको अपने पति के मृत देह के साथ बिठाकर गंगा में विसर्जित कर दिया जाए ताकि इस मार्ग से वह स्वर्ग तक पहूंच सके। बिहुला के अनुरोध पर मंजूषानुमा बहुमंजिला बेड़ा तैया किया गया। जिसकी दिवारों पर लहसन माली नामक चित्रकार के द्वारा बिहुला के साथ घटी घटनाओं, चांद सौदागर, सूर्य, चन्द्रमा, हाथी, घोड़ा, चम्पक पुष्प व मनियार नाग का चित्रण कराया गया। तत्पश्चात वह गंगा नदी के रास्ते तमाम मुसीबतों व आपदाओं से दो-चार होते हुए अंतत: स्वर्गलोक को पहुंची। जहां के धोबीघाट पर उसकी मुलाकात नेतुला नामक देवताओं के धोबी से हुई। बिहुला ने उस धोबी के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया, उसके द्वारा धोए जानेवाले कपडों में एक खास तरह की सुगंध आने लगी। इस सुगंध के बारे में जब देवताओं ने जानना चाहा तो नेतुला ने बताया कि इन कपड़ों को मेरी बेटी ने धोया है। इसके बाद बिहुला को देवताओं के सम्मुख ले जाया गया जहां उसे वरदान मांगने को कहा गया। बिहुला ने देवताओं से अपने मृत पति के साथ-साथ अपने छ: जेठों के पुर्नजीवन का वरदान मांगा। इधर देवी मनसा भी बिहुला की साधना आैर पतिव्रत से प्रसन्न हो चुकी थी। अंतत: इन सबों से इच्छित वरदान पाकर बिहुला अपने पति व जेठों को साथ लेकर चंपानगर वापस आ गई। अपने सभी बेटों को वापस पाकर प्रसन्न चांद सौदागर ने बिहुला के अनुरोध पर देवी मनसा को पूजना स्वीकार कर लिया। माना जाता है कि तभी से इस अंचल में उपरोक्त तिथि को देवी मनसा की पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। 

यह परंपरा कितनी प्राचीन है इसके बारे में तो प्रामाणिक तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। इस अंचल में पुरातत्व विभाग द्वारा 1970-71 में कर्णगढ़ की खुदाई में मिले सिंधुकालीन कुछ अवशेषों के आधार पर स्थानीय लोग इस परंपरा को सिंधुघाटी काल से जोड़कर देखते हैं। वैसे इस मंजूषा चित्रकला को स्थानीय अंचल से बाहर की दुनिया को परिचित कराने का श्रेय 1941 में भागलपुर में पदस्थापित रहे आई. सी. एस. अधिकारी व कला मर्मज्ञ डब्ल्यू. सी. आर्चर को जाता है। जिन्होंने स्थानीय मालाकार व कुंभकारों द्वारा बरती जाने वाली इस कला की कुछ कृतियों को लंदन स्थित इंडिया हाउस में प्रदर्शित किया। तब जाकर दुनिया सदियों पुरानी इस लोक परंपरा से जुड़ी मंजूषा चित्रकला से परिचित हो पायी। किन्तु कतिपय कारणों से कालांतर में यह चित्रकला सिमटती सी चली जाने लगी थी। सिर्फ विशेष अवसरों पर ही इसका चित्रण मालाकार व कुंभकारों के द्वारा किया जाने लगा था। किन्तु स्थानीय नागरिकों व संस्थाओं की पहल पर चक्रवर्ती देवी, मनोज पंडित व उलूपी कुमारी जैसे कलाकारों के विशेष योगदान से आज इसे एक चित्रशैली के तौर पर पहचान मिल चुकी है। इस चित्रशैली की कुछ खास विशेषताओं में एक है इसके अंकन के लिए सिर्फ हरा, पीला आैर लाल रंग का प्रयोग। आमतौर पर आकृति के रेखांकन में सिर्फ हरे रंग का प्रयोग किया जाता है वहीं पीला, हरा आैर लाल रंग से रेखाओं की बीच की जगह को भरा जाता है। मनसा देवी यानी पांचों बहनों को सर्परूप में एक साथ चित्रित किया जाता है। चम्पा फूल, मनियार सांप, नेतुला धोबी, चांद सौदागर, लखिन्दर जैसे इस कथा से जुड़े सभी पात्रों को एक खास पहचान के साथ चित्रित किया जाता है ताकि दर्शक उसे आसानी से समझ सके। पुरूष आकृतियों के चेहरे पर शिखा व मूंछ का होना अनिवार्य समझा जाता है। हालांकि अब जब इस कला को सिर्फ मंजूषा को अलंकृत करने तक सीमित रखने के बजाय व्यावसायिक उत्पादों व सजावटी सामानों पर भी चित्रित किया जाने लगा है तब रंग संगतियों में कुछ नए प्रयोग भी सामने आने लगे हैं। साथ ही किसी जमाने में जाति विशेष तक सीमित माने जाने वाली इस कला को समाज के विभिन्न तबकों द्वारा एक कलारूप के तौर पर अपनाया जा रहा है।

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