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Wednesday, 16 September 2020

प्रख्यात कलाविद् कपिला वात्स्यायन का 91 साल की उम्र में दिल्ली में निधन, अंतिम संस्कार आज

पद्म विभूषण से सम्मानित देश की प्रख्यात कलाविद् एवं राज्यसभा की पूर्व मनोनीत सदस्य कपिला वात्स्यायन का बुधवार को दिल्ली में गुलमोहर एंक्लेव स्थित उनके घर में निधन हो गया। वह 91 वर्ष की थीं।

कपिला वात्स्यायन के निधन से कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। वह हिंदी के यशस्वी दिवंगत साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की पत्नी थीं और साठ के दशक में अपने पति से तलाक के बाद वह एकांकी जीवन व्यतीत कर रही थीं। 
प्रख्यात संस्कृति कर्मी अशोक वाजपेयी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि श्रीमती वात्स्यायन एक महान विदुषी थीं और विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं। उन्होंने सहित्य, कला और संस्कृति के संवर्धन तथा विकास के लिए ऐतिहासिक कार्य किया। वह अपने आप में एक संस्था थीं और कला से जुड़ी संस्थाओं का निर्माण किया तथा कलाकारों के बीच संवाद कायम करने में एक सेतु का काम किया। उनका निधन मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है।

25 दिसंबर 1928 को जन्मीं कपिला वात्स्यायन राष्ट्रीय आंदोलन की प्रसिद्ध लेखिका सत्यवती मलिक की पुत्री थीं। वह संगीत नृत्य और कला की महान विदुषी थीं। उनकी शिक्षा दीक्षा दिल्ली बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में हुई थी। 

संगीत नाटक अकादमी फेलो रह चुकीं कपिला प्रख्यात नर्तक शम्भू महाराज और प्रख्यात इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल की शिष्या भी थीं। वह 2006 में राज्यसभा के लिए मनोनीत सदस्य नियुक्त की गई थीं और लाभ के पद के विवाद के कारण उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता त्याग दी थी। इसके बाद वह दोबारा फिर राज्यसभा की सदस्य मनोनीत की गई थीं।

श्रीमती वात्स्यायन राष्ट्रीय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की संस्थापक सचिव थी और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की आजीवन ट्रस्टी भी थीं। उन्होंने भारतीय नाट्यशास्त्र और भारतीय पारंपरिक कला पर गंभीर और विद्वतापूर्ण पुस्तकें भी लिखी थीं। वह देश में भारतीय कला शास्त्र की आधिकारिक विद्वान मानी जाती थीं। 

कपिला के भाई केशव मलिक जाने-माने अंग्रेजी के कवि और कला समीक्षक थे। श्रीमती वात्स्यायन साठ के दशक में शिक्षा विभाग में सचिव पद पर भी कार्यरत थीं।

 बताया जा रहा है कि उनका अंतिम संस्कार बुधवार दोपहर को 2 बजे लोधी श्मशान घाट पर किया जाएगा। हालांकि, मौजूदा कोविड-19 पाबंदियों के चलते वहां सीमित संख्या में परिजन ही उपस्थित रहेंगे। 

Friday, 28 August 2020

Sports Day 2020: खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार की पूरी लिस्ट

पूरे देश में आज (29 अगस्त) को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जा रहा है। मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन के मौके पर राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद राजीव गांधी खेल अवॉर्ड, अर्जुन अवॉर्ड, द्रोणाचार्य अवॉर्ड और ध्यानचंद आजीवन अवॉर्ड देंगे। देखिए किन-किन खिलाड़ियों को मिलेगा कौन सा सम्मान-

राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड 2020

खिलाड़ी का नामखेल
रोहित शर्माक्रिकेट
मरियप्पन टीपैरा एथलीट
मनिका बत्राटेबल टेनिस
विनेश फोगाटकुश्ती
रानी रामपालहॉकी

द्रोणाचार्य अवॉर्ड (लाइफटाइम कैटगरी) 2020

कोच का नामखेल
धर्मेंद्र तिवारीतीरंदाजी
स्वर्गीय पुरुषोत्तम रायएथलेटिक्स
शिव सिंहमुक्केबाजी
रोमेश पठानियाहॉकी
कृष्णन कुमार हुड्डाकबड्डी
विजय भालचंद्र मुनीश्वरपैरा पॉवरलिफ्टिंग
नरेश कुमारटेनिस
ओम प्रकाश दहियाकुश्ती

द्रोणाचार्य अवॉर्ड (रेगुलर कैटेगरी) 2020

कोच का नामखेल
जूड फेलिक्सहॉकी
योगेश मालवीयमलखंब
जसपाल राणानिशानेबाजी
कुलदीप कुमार हंडूवुशु
गौरव खन्नापैरा बैडमिंटन

अर्जुन अवॉर्ड 2020

खिलाड़ी का नामखेल
अतानु दासतीरंदाजी
दुती चंदएथलेटिक्स
सात्विकसाईराज रेंकीरेड्डीबैडमिंटन
चिराग शेट्टीबैडमिंटन
विशेष भृगुवंशीबास्केटबॉल
मनीष कौशिकमुक्केबाजी
लवलीना बोरगोहेनमुक्केबाजी
इशांत शर्माक्रिकेट
दीप्ती शर्माक्रिकेट
अजय आनंत सावंतघुड़सवारी
संदेश झिंगनफुटबॉल
अदिति अशोकगोल्फ
आकाशदीप सिंहह़ॉकी
दीपिकाहॉकी
दीपककबड्डी
सरिका सुधाकर कालेखो-खो
दत्तू बबन भोकानलरोइंग
मनु भाकरनिशानेबाजी
सौरभ चौधरीनिशानेबाजी
मधुरिका सुहास पाटकरटेबल टेनिस
दिविज शरणटेनिस
शिवा केशवनल्यूज
दिव्या काकरानकुश्ती
राहुल अवारेकुश्ती
सुयश नारायण जाधवपैरा तैराकी
संदीपपैरा एथलीट
मनीष नरवालपैरा निशानेबाजी

ध्यानचंद अवॉर्ड्स 2020

खिलाड़ी का नामखेल
कुलदीप सिंह भुल्लरएथलेटिक्स
जिंसी फिलिप्सएथलेटिक्स
प्रदीप गंधेबैडमिंटन
तृप्ति मुरगुंडेबैडमिंटन
एन उषामुक्केबाजी
लक्खा सिंहमुक्केबाजी
सुखविंदर सिंह संधूफुटबॉल
अजीत सिंह हॉकी
मनप्रीत सिंहकबड्डी
जे रंजीत कुमार पैरा एथलीट
सत्यप्रकाश तिवारीपैरा बैडमिंटन
मंजीत सिंहरोइंग
सचिन नागतैराकी
नंदन पालटेनिस
नेत्रपाल हुड्डाकुश्ती

 

मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ट्रॉफीः पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़

Thursday, 27 August 2020

मधुबनी के अविनाश की पेंटिंग ‘नटराज’ चर्चा में, 2.48 लाख की लगी बोली

अगस्त 2020 की फोक एंड ट्राइबल आर्ट की नीलामी का परिणाम आते ही इस पर देश भर में चर्चाएं हो रही है। सैफरन आर्ट की स्टोरी लिमिटेड के नो रिज़र्व ऑक्शन में मधुबनी शैली के कलाकार अविनाश कर्ण की पेंटिंग 'नटराज' पर दो लाख अड़तालीस हज़ार की बोली लगी। वह जिले के रांटी गांव के रहनेवाले हैं. 

इससे पहले इसी साल जून में दिवंगत मधुबनी कलाकार पद्मश्री सीता देवी की एक पेंटिंग 'कदम का पेड़' चार लाख 36 हज़ार में बिकी थी। इसके साथ ही छह वर्षों में पहली बार मिथिला ने सबसे कीमती बिकने वाली लोक कला शैलियों में प्रथम पायदान हासिल किया था। इससे पहले इस स्थान पर गोंड शैली का वर्चस्व रहा है। 

नीलामी में हिस्सा लेने वाली एवं दिल्ली स्थित गैलरी आर्ट्स ऑफ़ दि अर्थ की संस्थापिका मीणा वर्मा ने बताया कि पहले लोक कला के क्षेत्र में कोई भी ऑक्शन हाउस जोखिम लेने से डरते थे. अगर नीलामी होती भी थी तो उनमे पहले से स्थापित वरिष्ठ कलाकार को ही शामिल किया जाता था। लेकिन सैफरन आर्ट ने यह जोखिम लिया और उभरते युवा कलाकारों को भी इसमें शामिल किया.  

देश भर की तमाम समकालीन कलाकारों के साथ अपने मिथिला्स को प्रदर्शित कर चुके अविनाश कर्ण ने बताया कि जब वे एम एफ हुसैन के चित्रों कि नीलामी के बारे में सुना करते थे तो सोचते थे कि मिथिला कि नीलामी क्यों नहीं होती। इस शैली को सौ - दो सौ रुपये में क्यों बेच दिया जाता है। बाद में उन्होंने बीएचयू से कला की पढाई करते वक़्त जाना कि केवल मिथिला ही नहीं बल्कि भारत के सभी कला शैलियों को ‘फोक आर्ट’ कह कर उसे क्राफ्ट बाजार में उतार दिया गया है. जिससे इसका मूल्य हस्तकला वाली निर्धारित कर दी गयी है।  

इसके बाद उन्होंने इस कला को समकालीन रूप देना शुरू किया और फिर इनके चित्र समकालीन दीर्घाओं में प्रदर्शित की जाने लगी। पिछले साल अप्रैल में इन्हे स्विट्ज़रलैंड की एक अंतर्राष्ट्रीय कला महोत्सव में आमंत्रित किया गया। यहां इन्होने लोक कलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार पर दुनिया भर के कला प्रेमियों के बीच अपनी बात रखी थी।


Tuesday, 25 August 2020

चित्रकला प्रतियोगिता प्रश्न

Q.1 किस चित्र शैली में पीले रंग की बहुलता रही है एवं शैली के  भित्ति चित्र अजारा की ओवरी , व मोती महल आदि में देखने को मिलते हैं

(A) मेवाङ शैली
(B) देवगढ़ शैली ✔
(C) बूँदी शैली
(D) अजमेर शैली

Q.2 किस शैली के पूर्ण विकास का काल 16वीं  से 17 शताब्दी रहा है तथा किस शैली में कला एवं संस्कृति का नवीन परिवेश देने का श्रेय मालदेव को है?
(A) जोधपुर शैली ✔
(B) देवगढ शैली
(C) जैसलमेर शैली
(D) मथेन शैली

Q.3 जोधपुर चित्र शैली में किस राजा के समय ऐतिहासिक सचित्र ग्रंथों में ढोला मारू तथा पुस्तक प्रकाश ,जोधपुर की `भागवत´ का प्रमुख स्थान माना जाता है
(A) मालदेव
(B) जसवन्तसिंह
(C) सूरसिंह ✔
(D) गजसिंह

Q.4 महाराजा मानसिंह ने किस चित्रशैली को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया तथा इसके चित्रकार शिवदान द्वारा सन 1816 में बने इस शैली कें चित्र में स्त्री को हुक्का पीतेहुए दिखाया गया है बताइए यह सभी विशेषता किस चित्रशैली की मानी गई है
(A) बिकानेर शैली
(B) मेवाङ शैली
(C) किशनगढ़ शैली
(D) जोधपुर शैली ✔

Q.5 किस चित्र शैली में आकाश को सुनहरे छल्लो युक्त मेगाच्छादित दिखाया गया है बरसते बादलों में से सारस -मिथुनों की नयनाभिराम आकृतियां भी इस शैली की प्रमुख विशेषताएं यहाँ फ़व्वारों , दरबार के दिखाओ आदी में दक्षिणी शैली का प्रभाव दिखाई देता :निम्न विशेषताएं किस शैली को दर्शाती है?

(A) किशनगढ शैली
(B) बीकानेर शैली ✔
(C) बूदी शैली
(D) देवगढ़ शैली

Q.6 राजस्थान की प्रमुख शैलियों में से किस शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय `एरिक डिकिन्सन तथा ड्रा फ़ैयान अली´ को जाता हैं?
(A) अजमेर शैली
(B) जैसलमेर शैली
(C) जयपुर शैली
(D) किशनगढ़ शैली ✔

Q.7 निम्न में से किस शैली की प्रमुख विशेषताएं में कानों में कुंडल, गले में मोतियों का हार, माथे पर वैष्णवी तिलक, हाथ में तलवार, कमर में कटार, तथा पैरों में मोजड़ी धारण किए सांमत कला के उत्तम उदाहरण माने जाते हैं?
(A) नागौर शैली
(B) अजमेर शैली✔
(C) बूँदी शैली
(D) किशनगढ़ शैली

Q.8 राजस्थान की प्रमुख शैलियों में से एक कौन सी शैली की प्रमुख विशेषता यह रही है कि इसमें मुगल या जोधपुरी शैली का प्रभाव में आने दिया बल्कि यह एकदम स्थानीय शैली है जिसको वैज्ञानिको द्वारा स्थानीय सैनी की मान्यता प्रदान की गई हैं?
(A) जैसमेर शैली ✔
(B) नागौर शैली
(C) बिकानेरी शैली
(D) देवगढ़ी शैली

Q.9 बूंदी शैली की प्रमुख विशेषताओं में रंगमहल है तो बताइए प्रसिद्ध रंगमहल किस शासक ने बनाया जो सुंदर भित्ति चित्रों के लिए विश्व प्रसिद्ध है यहां के भित्ती चित्रों की सुंदरता व अनुपम रंग उपन्यास को देख दर्शक आश्चर्यचकित सा रह जाते है
(A) रसराज
(B) राव उम्मेदसिंह
(C) छत्रसाल✔
(D) सुर्जन हाङा

Q.10 आकाश में उमड़ते हुए काले कजरारे मेघ, बिजली की कौध, घनघोर वर्षा ,नदी में उड़ती जल तरंगें ,हरे भरे वृक्ष ,और उन पर चहकती चिड़िया ,नाचते मोर,  कलाबाजी दिखाते वानर, तथा पहाड़ की तलहटी में विचरण करते वन्य-जीवों का चित्र किस शैली में बड़ा ही मनोहारी है?
(A) कोटा शैली
(B) बणी-ठणी
(C) बूँदी शैली ✔
(D) झालावाङ शैली

Q.11 किस शैली में नारियों एवं रानियों को भी शिकार करते हुए दिखाया जाना एक गहन जंगलों में शिकार की बहुलता के कारण यह इस शैली का प्रतीक चिन्ह बन गया यह किस शैली की बात है
(A) कोटा शैली ✔

(B) बूँदी शैली
(C) ढ़ूंढाङ शैली
(D) जयपुर शैली

Q.12 कोटा शैली में एक नवीन परिवर्तन सन 1771 में आया जिसका श्रेय उमेद सिंह को है कोटा शैली का चरमोत्कर्ष उमेद सिंह के समय में हुआ ।जवान महाराव को शिकार का शोक था। कोटा का गहन एवं विकट जंगल शिकार के लिए अत्यधिक उपयोगी था ।*कोटा के किस खाने के कलाकारों ने भित्तीयों पर तो बड़े बड़े चित्र बनाए ही, साथ ही बड़ी-बड़ी वसलियों पर शिकार का समूह चित्रण हूआं।जिसने कोटा शैली को विशिष्टा प्रधान की वों किस खाने के व्यक्ति थे?
(A) मेथेनखाने
(B) डाड़ीखाने
(C) चूरूडियाखाने
(D) मुसिव्विरखाने✔

Q.13 सोहरियाँ क्या हैं ?
(A)  व्याधि निवारण हेतु ग्रामीण अंचलों में गोबर का पात्र
(B) भोजन सामग्री रखने के मिट्टी के पात्र✔
(C) ढूंढाड़ अंचल में बनाए जाने वाले भटवाडी
(D) होली के अवसर पर लकड़ी के तलवार नुमा खड़े

Q.14 कैनवास की चितेरी?
(A)  श्रीमती प्रतिभा पांडे✔
(B) श्रीमती जानकी देवी
(C) श्रीमती लक्ष्मी बाई
(D) श्रीमती गवरी बाई

Q.15  राई के दाने पर मीरा का चित्रांकन करने वाला चित्रकार कौन था
(A) समंदर सिंह खंगारोत
(B) कैलाश चंद्र शर्मा
(C) प्रदीप मुखर्जी
(D) किशन शर्मा✔

Saturday, 22 August 2020

राम के नाम समर्पित डाक टिकट

#प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने #भगवान #राम के जीवन और राम मंदिर के मॉडल पर आधारित एक #डाक_टिकट जारी किया था. इसकी डिमांड भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है.लोग इसे सहेजकर रखने के लिए खरीद रहे हैं ताकि वे आने वाली पीढ़ियों को वे इसे दिखा सकें.

डाक विभाग के पास इसकी #60_हजार #प्रतियां उपलब्ध थीं. चार दिनों में अयोध्या शोध संस्थान ने 5 हजार टिकट खरीदे हैं. इसके लिए 12 लाख रुपये डाक विभाग को अदा किये गये हैं. वहीं, 500टिकट डाक ऑफिस लखनऊ-अयोध्या से खरीदे गये हैं.

एक शीट पर 12 टिकट, एक की कीमत 25 रुपये : पोस्टल सर्विसेज मुख्यालय में लखनऊ क्षेत्र के डायरेक्टर केके यादव ने बताया कि डाक टिकट को लेकर लगातार देश-विदेश से फोन कॉल्स आ रहे हैं. कॉरपोरेट माई स्टैंप के तहत बने कस्टमााइज्ड डाक टिकटों की कुल अब तक 5500 टिकट की बिक्री हो चुकी है. बताया कि, 5 हजार शीट प्रिंट कराये गये हैं.

एक शीट पर कुल 12 डाक टिकट है और एक स्टाम्प की कीमत 25 रुपये हैं. कुल मिलाकर एक सीट की कीमत भारतीय डाक विभाग ने तीन सौ रुपये तय की है. डाक टिकट का मामला आस्था से जुड़ा होने के कारण इसकी डिमांड काफी बढ़ गयी है. डिमांड सिर्फ लखनऊ अयोध्या या देश के कोने-कोने से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी आ रही है.

बता दें कि अयोध्या राम मंदिर भूमि पूजन (Ayodhya Ram Mandir Bhumi Pujan) के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'श्री राम जन्मभूमि मंदिर' का डाक टिकट भी जारी किया था. यादगार के तौर पर जारी किया गया ये डाक टिकट राम जन्मभूमि मंदिर के मौजूदा मॉडल पर बनाया गया है. गौरतलब है कि इससे पहले भी प्रधानमंत्री मोदी भगवान श्री राम पर 11 स्मारक डाक टिकट जारी कर चुके हैं.

Wednesday, 19 August 2020

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में एक रहस्यमयी गुफा

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में कनालीछीना विकासखंड के खनपर गांव में मंदिर के सौंदर्यीकरण और चौड़ीकरण के दौरान की जा रही खुदाई में एक रहस्यमयी गुफा मिली है। यह गुफा 15 मीटर लंबी और 10 मीटर चौड़ी है। गुफा को अंदर से देखने वाले लोग भी हैरानी में हैं।इस गुफा के भीतर शिवलिंग की आकृति का सफेद पत्थर, जलधारा समेत अनेक कलाकृतियां हैं। दूरदराज से लोग गुफा को देखने पहुंच रहे हैं। लोग हैरान हैं कि जमीन के अंदर ऐसी आकृतियां कहां से आई हैं। 

खनपर गांव के पास स्थित गुफा वाली माता के नाम से प्रसिद्ध मंदिर हैं। यहां पर धर्मशाला, सौंदर्यीकरण और आंगन का निर्माण किया जा रहा है। दो दिन पहले यहां पर पोकलैंड मशीन से चट्टानों को काटा जा रहा था। 
पोकलैंड ऑपरेटर नीरज ने बताया कि उन्हें पहाड़ी के अंदर छोटी सी गुफा दिखाई दी। निर्माण कार्य में लगे लोग गुफा के अंदर गए तो वहां श्वेत शिवलिंग, उसके ऊपर से टपकती जलधारा, जलकुंड, शंख और पहाड़ी में बनी तमाम कलाकृतियां नजर आईं। 
गुफा देखने पहुंच रहे लोगों की भीड़ को देखते हुए वहां कार्य रोक दिया गया है। प्रवेश द्वार के पास गुफा की ऊंचाई लगभग चार फीट और अंदर सात फीट है। गुफा को देखकर लोग कई तरह के कयास लगा रहे हैं। 


खनपर निवासी हरीश तिवारी ने कहा कि गुफा को पाताल भुवनेश्वर की तर्ज पर विकसित किया जा सकता है। उन्होंने पुरातत्व विभाग से गुफा का सर्वेक्षण करने की मांग की है। 


यह प्राकृतिक गुफा है। गुफा के भीतर जो भी आकृतियां इस तरह बनी होती हैं वह चूने की होती हैं। जिस स्थान पर यह गुफा है वह यातायात से जुड़ा हुआ है। ऐसे में पर्यटन की दृष्टि से यह बेहद लाभकारी हो सकता है। शीघ्र ही गुफा का सर्वेक्षण किया जाएगा। 
- चंद्र सिंह चौहान, पुरातत्वविद अल्मोड़ा। 


Tuesday, 18 August 2020

गूलेर शैली

@:-गुलेर शैली पहाड़ी शैली का उद्गम स्थल शैली है

@:-गूलर शैली की स्थापना हरिपुर राज्य से शुरू होती है 
जो कि हरिपुर राज्य की स्थापना 1405 ईस्वी में राजा उदय सिंह के द्वारा होता है।

@:-गुलेर शैली की स्थापना 1406 इसवी में राजा उदय सिंह के भाई राजा हरिश्चंद्र द्वारा होता है।

@:-गुलेर शैली को मुगलों द्वारा संरक्षण प्राप्त हुआ था यानी गुले शैली की स्थापना में मुगल बहुत बड़ा सहयोग किए थे।

@:-गुलेर शैली का विकसित रूप कांगड़ा शैली है यानी गुलेर शैली धीरे-धीरे विकसित होते होते कांगड़ा शैली के रूप में आ गया।
चित्रण:-
गोल पहाड़ियों का चित्रण हुआ है।
कहीं-कहीं सूखे पत्तों वाले वृक्षों का अंकन हुआ है।
गदली यानी केले का वृक्ष का अंकन हुआ है।

चित्र:-
राजा विक्रम सिंह हाथी पर बैठे हुए। (जो विक्रम सिंह के समय बना था)
रामायण पर आधारित 14 चित्र जो दिलीप सिंह के समय बना था।
सबसे प्रमुख चित्रों में राजा गोवर्धन अपने बेटे प्रकाश सिंह के साथ हुक्का पीते हुए जो 1750 ईसवी में बना था।
शासक:-
:-राजा हरिश्चंद्र
:-राजा रूपचंद
:-राजा मानसिंह (जिन्हें मुगलों द्वारा अफगानी चिता की उपाधि प्राप्त हुई थी)
:-राजा विक्रम सिंह (चित्र:-राजा विक्रम सिंह हाथी पर बैठे हुए।)
:-राजा राज सिंह
:-राजा प्रकाश सिंह
:-राजा दलीप सिंह (रामायण पर आधारित 14 चित्र बनवाएं)

चित्रकार:-
मंकू और नयनसुख यह दो चित्रकार रहे। यह दोनों पंडित शिव के पुत्र थे जो कि वह भी खुद एक चित्रकार थे।

विषय:-
धार्मिक दरबारी नायिका व्यक्ति चित्र


विख्यात चित्रकार, प्रिंटमेकर, मूर्तिकार व कवि"जय झारोटिया"

• नाम - जय झारोटिया
• जन्म - 1945
• जन्म स्थान - नयी दिल्ली
• कला शिक्षा - दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट, नई दिल्ली
• विशेष सम्मान - राष्ट्रीय ललित कला अकादमी अवार्ड सहित
  ड्राइंग, प्रिन्टमेकिग और ग्राफिक्स के राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय संयंत्र
  की अनेक संस्थाओं के सम्मानों से सम्मानित
• चित्र संग्रह - ललित कला अकादमी, नई दिल्ली
  नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, नई दिल्ली सहित
  देश-विदेश के अनेकों निजी व राजकीय संग्रहालयों
  में चित्र संग्रहित

विख्यात चित्रकार, प्रिंटमेकर, मूर्तिकार व कवि
"जय झारोटिया" ..... ने लगभग 35 से अधिक
एकल, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पर अपने चित्रों की
प्रर्दशनीयां आयोजित की वही ..... राष्ट्रीय और
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर .... 300 से अधिक समूह
प्रर्दशनीयो में शिरकत की है . उम्दा रचनात्मक
चित्रण के साथ साथ ....... प्रिंटमेकिंग में अपने
बेजोड़ कौशल के लिए "झारोटिया" राष्ट्रीय और
अंतर्राष्ट्रीय -कला जगत में विशेष रुप से अपनी
अहम जगह बना चुके हैं ... "झरोटिया" की दृष्टि
केवल .. उस चीज़ को चित्रित करने के लिए ही
नहीं है .. जिसे केवल समझाया और समझा जा
सकता है, बल्कि तार्किकता से परे एक रहस्यमय
दुनिया में तल्लीन करने के लिए तथा दर्शकों को
इनकी कृतियां बेखुबी से सम्मोहित व "मंत्र मुग्ध"
करने में भी पूर्णतया दक्ष है .. कला के शैक्षणिक
क्षेत्र में आप ..... "दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट" में
क्रमिक रुप से व्याख्याता ..... प्रोफेसर ..... और
विभागाध्यक्ष के पदों पर रहकर युवा कलाकारों
की नई पीढ़ी को तैयार करने में ... अपनी अहम
भूमिका निभाते रहे .दृश्य-अदृश्य, स्पष्ट-मायावी
और चेतन-अचेतन के बीच इनकी कृति के साथ
लेखन में सिद्धहस्त "झारोटिया" ... अपनी कला
यात्रा में निरन्तर अग्रसर है ...."दिल्ली" प्रदेश के
ऐसे विलक्षण विशेष प्रतिभा सम्पन्न चित्रकार के 
कुछ प्रतिनिधि चित्रों को ... "दिल्ली" के विख्यात
हस्ताक्षर चित्र श्रृंखला के तहत साझा कर रहा हूं !

• चित्र सृजन दर्शन -
  - दृश्य, अदृश्य, चेतन व अचेतन के मंथन से रचनात्मक
    चित्र व प्रिंन्टस का सृजन
 
• सचेत रहें : मास्क पहनें : स्वस्थ रहें
• सर्वे भवन्तु सुखिन - सर्वे सन्तु निरामया

चित्रकला प्रतियोगिता प्रश्नोत्तर


1 किस चित्र शैली में पीले रंग की बहुलता रही है एवं शैली के  भित्ति चित्र अजारा की ओवरी , व मोती महल आदि में देखने को मिलते हैं

(A) मेवाङ शैली
(B) देवगढ़ शैली ✔
(C) बूँदी शैली
(D) अजमेर शैली

Q.2 किस शैली के पूर्ण विकास का काल 16वीं  से 17 शताब्दी रहा है तथा किस शैली में कला एवं संस्कृति का नवीन परिवेश देने का श्रेय मालदेव को है
(A) जोधपुर शैली ✔
(B) देवगढ शैली
(C) जैसलमेर शैली
(D) मथेन शैली

Q.3 जोधपुर चित्र शैली में किस राजा के समय ऐतिहासिक सचित्र ग्रंथों में ढोला मारू तथा पुस्तक प्रकाश ,जोधपुर की `भागवत´ का प्रमुख स्थान माना जाता है
(A) मालदेव
(B) जसवन्तसिंह
(C) सूरसिंह ✔
(D) गजसिंह

Q.4 महाराजा मानसिंह ने किस चित्रशैली को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया तथा इसके चित्रकार शिवदान द्वारा सन 1816 में बने इस शैली कें चित्र में स्त्री को हुक्का पीतेहुए दिखाया गया है बताइए यह सभी विशेषता किस चित्रशैली की मानी गई है
(A) बिकानेर शैली
(B) मेवाङ शैली
(C) किशनगढ़ शैली
(D) जोधपुर शैली ✔

Q.5 किस चित्र शैली में आकाश को सुनहरे छल्लो युक्त मेगाच्छादित दिखाया गया है बरसते बादलों में से सारस -मिथुनों की नयनाभिराम आकृतियां भी इस शैली की प्रमुख विशेषताएं यहाँ फ़व्वारों , दरबार के दिखाओ आदी में दक्षिणी शैली का प्रभाव दिखाई देता :निम्न विशेषताएं किस शैली को दर्शाती है
(A) किशनगढ शैली
(B) बीकानेर शैली ✔
(C) बूदी शैली
(D) देवगढ़ शैली

Q.6 राजस्थान की प्रमुख शैलियों में से किस शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय `एरिक डिकिन्सन तथा ड्रा फ़ैयान अली´ को जाता हैं।
(A) अजमेर शैली
(B) जैसलमेर शैली
(C) जयपुर शैली
(D) किशनगढ़ शैली ✔

Q.7 निम्न में से किस शैली की प्रमुख विशेषताएं में कानों में कुंडल, गले में मोतियों का हार, माथे पर वैष्णवी तिलक, हाथ में तलवार, कमर में कटार, तथा पैरों में मोजड़ी धारण किए सांमत कला के उत्तम उदाहरण माने जाते हैं
(A) नागौर शैली
(B) अजमेर शैली✔
(C) बूँदी शैली
(D) किशनगढ़ शैली

Q.8 राजस्थान की प्रमुख शैलियों में से एक कौन सी शैली की प्रमुख विशेषता यह रही है कि इसमें मुगल या जोधपुरी शैली का प्रभाव में आने दिया बल्कि यह एकदम स्थानीय शैली है जिसको वैज्ञानिको द्वारा स्थानीय सैनी की मान्यता प्रदान की गई हैं
(A) जैसमेर शैली ✔
(B) नागौर शैली
(C) बिकानेरी शैली
(D) देवगढ़ी शैली

Q.9 बूंदी शैली की प्रमुख विशेषताओं में रंगमहल है तो बताइए प्रसिद्ध रंगमहल किस शासक ने बनाया जो सुंदर भित्ति चित्रों के लिए विश्व प्रसिद्ध है यहां के भित्ती चित्रों की सुंदरता व अनुपम रंग उपन्यास को देख दर्शक आश्चर्यचकित सा रह जाते है
(A) रसराज
(B) राव उम्मेदसिंह
(C) छत्रसाल✔
(D) सुर्जन हाङा

Q.10 आकाश में उमड़ते हुए काले कजरारे मेघ, बिजली की कौध, घनघोर वर्षा ,नदी में उड़ती जल तरंगें ,हरे भरे वृक्ष ,और उन पर चहकती चिड़िया ,नाचते मोर,  कलाबाजी दिखाते वानर, तथा पहाड़ की तलहटी में विचरण करते वन्य-जीवों का चित्र किस शैली में बड़ा ही मनोहारी है
(A) कोटा शैली
(B) बणी-ठणी
(C) बूँदी शैली ✔
(D) झालावाङ शैली

Q.11 किस शैली में नारियों एवं रानियों को भी शिकार करते हुए दिखाया जाना एक गहन जंगलों में शिकार की बहुलता के कारण यह इस शैली का प्रतीक चिन्ह बन गया यह किस शैली की बात है
(A) कोटा शैली ✔
(B) बूँदी शैली
(C) ढ़ूंढाङ शैली
(D) जयपुर शैली

Q.12 कोटा शैली में एक नवीन परिवर्तन सन 1771 में आया जिसका श्रेय उमेद सिंह को है कोटा शैली का चरमोत्कर्ष उमेद सिंह के समय में हुआ ।जवान महाराव को शिकार का शोक था। कोटा का गहन एवं विकट जंगल शिकार के लिए अत्यधिक उपयोगी था ।*कोटा के किस खाने के कलाकारों ने भित्तीयों पर तो बड़े बड़े चित्र बनाए ही, साथ ही बड़ी-बड़ी वसलियों पर शिकार का समूह चित्रण हूआं।जिसने कोटा शैली को विशिष्टा प्रधान की वों किस खाने के व्यक्ति थे
(A) मेथेनखाने
(B) डाड़ीखाने
(C) चूरूडियाखाने
(D) मुसिव्विरखाने✔

Q.13 सोहरियाँ क्या हैं
(A)  व्याधि निवारण हेतु ग्रामीण अंचलों में गोबर का पात्र
(B) भोजन सामग्री रखने के मिट्टी के पात्र✔
(C) ढूंढाड़ अंचल में बनाए जाने वाले भटवाडी
(D) होली के अवसर पर लकड़ी के तलवार नुमा खड़े

Q.14 कैनवास की चितेरी?
(A)  श्रीमती प्रतिभा पांडे✔
(B) श्रीमती जानकी देवी
(C) श्रीमती लक्ष्मी बाई
(D) श्रीमती गवरी बाई

Q.15  राई के दाने पर मीरा का चित्रांकन करने वाला चित्रकार कौन था
(A) समंदर सिंह खंगारोत
(B) कैलाश चंद्र शर्मा
(C) प्रदीप मुखर्जी
(D) किशन शर्मा✔

भारतीय शास्त्रीय गायक पंडित जसराज

#पंडित_जसराज_. (#गायक)
* पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हिसार (हरियाणा) में हुआ था
* उनके पिता पंडित मोतीराम जी भी मेवात घराने में एक संगीतज्ञ थे
* शुरुआती तालीम उन्हें अपने पिता से ही मिली और उसके बाद उन्होंने मेवाती घराने के महाराणा जयवंत सिंह वाघेला और आगरा के स्वामी वल्लभदास से संगीत की शिक्षा ली
* उन्हें साल 2000 में भारत सरकार की ओर से पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था
* पंडित जसराज ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाई दी थी
* पंडित जसराज ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व फलक पर अहम स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
* इतना ही नहीं उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी गाने गाये थे
* जसराज के पिता खुद भी मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे
* पंडित जसराज दुनिया भर में अपनी गायकी से प्रसिद्ध थे
* अमेरिका में उन्होंने कई बार प्रस्तुतियां दी
* पंडित जसराज ने बॉलीवुड के लिए पहला गीत ''वंदना करो' 1966 में आई फिल्म 'लड़की शहयाद्री की' में गाया था, जो कि एक भजन था
* देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण (2000 में) से नवाजे जा चुके जसराज को 1975 में पद्मश्री सम्मान मिला था
* पंडित जसराज को श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित भगवान कृष्ण की मधुर स्तुति मधुराष्टकम् ने घर-घर पहुंचा दिया उनकी आवाज में गाए इस मधुराष्टकम् से लोग उनके नाम के मुरीद हो गए
* नासा ने साल 2019 में पंडित जसराज के नाम पर 13 साल पुराने खोजे गए एक ग्रह का नाम रखा
* ग्रह की खोज नासा और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के वैज्ञानिकों ने मिलकर की थी
* ग्रह का नाम पंडित जसराज के जन्मतिथि के उलट रखा गया था. उनकी जन्मतिथि 28/01/1930 है और ग्रह का नंबर 300128 था
* ग्रह का पूरा नाम- ‘माइनर प्लेनेट’ 2006 वीपी 32 (नंबर 300128) था
* नासा ने इस ग्रह का नामकरण करते समय कहा था कि पंडित जसराज ग्रह हमारे सौरमण्डल में गुरु और मंगल के बीच रहते हुए सूर्य की परिक्रमा कर रहा है

* जाने माने शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का अमेरिका में 17 अगस्त 2020 को निधन हो गया है. वे 90 साल के थे
* उन्होंने अमेरिका के न्यू जर्सी में अंतिम सांस ली कुछ समय से वह परिजन के साथ यूएस में थे
* पंडित जसराज के निधन से संगीत जगत शोक में डूब गया है
* प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज की बेटी दुर्गा जसराज ने ये जानकारी दी
* पंडित जसराज के परिवार ने एक बयान में कहा कि बहुत दुख के साथ हमें सूचित करना पड़ रहा है कि संगीत मार्तंड पंडित जसराज जी का अमेरिका के न्यूजर्सी में अपने आवास पर आज सुबह 5 बजकर 15 मिनट पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया
* प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक जताया है और कहा है कि उनकी मौत से भारतीय शांस्त्रीय संगीत को अपूरणीय क्षति पहुंची है
* उनकी संगीत अपने आप में उत्कृष्ट था. कई गायकों के लिए एक असाधारण गुरु के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई. उनके परिवार और प्रशंसकों को मेरी संवेदनाएं

Monday, 17 August 2020

दुनिया की 6 सबसे भयावह पेंटिंग्स, जिन्हें अज्ञात जगहों पर छिपाना पड़ा

   यूक्रेन की कलाकार स्वेतलाना टेलेट्स ने वैसे तो खूब सारी ऐसी तस्वीरें बनाईं, जो ख्यात हुईं, लेकिन एक पेंटिंग की काफी चर्चा होती है. The Rain Woman शीर्षक से इस तस्वीर में बारिश के बीच एक स्त्री की आकृति दिखती है. काले और सफेद रंगों के बीच हल्के हरे रंग की झलक भी है. इस पेंटिंग के बारे में कलाकार का कहना है कि उसने सिर्फ 5 घंटे में ये तस्वीर बना डाली. उस वक्त के बारे में स्वेतलाना ने बताया कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई हाथ पकड़कर तस्वीर बनवा रहा हो. इस पेंटिंग को कई लोगों ने ऊंची कीमत पर खरीदा लेकिन घर ले जाकर सजाने के कुछ घंटों या दिनों बाद हर कोई उसे वापस करने आ गया. लोगों का कहना था कि पेंटिंग को ड्रॉइंगरूम में रखते ही घर में उदासी छा गई. लोगों को नींद आनी बंद हो गई और हर जगह पैरानॉर्मल चीजें नजर आने लगीं.

    सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर बात करते हुए रिया चक्रवर्ती (Rhea Chakraborty on Sushant Singh Rajput death ) ने एक पेंटिंग का जिक्र किया था. रिया का कहना है कि यूरोप ट्रिप के दौरान उस पेंटिंग को देखने के बाद से सुशांत असामान्य व्यवहार करने लगे. उस पेंटिंग में शनि अपने ही नवजात बेटे को खा रहा (Saturn devouring his son) है. ये वास्तव में काफी डिस्टर्ब करने वाली कलाकृति है. वैसे कई सारी पेंटिंग्स हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें देखने वाला परेशान हो जाता है. कई ऐसी पेंटिंग्स भी हैं, जिन्हें थोड़ी देर देखने पर ही लोगों ने पैरानॉर्मल चीजों की बात शुरू कर दी. जानिए, दुनियाभर की कुछ सबसे खौफनाक पेंटिंग्स के बारे में.
Love Letters' Replica नाम की एक पेंटिंग भी लोगों को डराती है. इसमें एक प्यारी-सी बच्ची हाथों में गुलाब और एक हाथ में लिफाफा पकड़े हुए है. सुनहरे बालों वाली बच्ची की उम्र चार-पांच साल के आसपास है. बच्ची की तस्वीर के पीछे एक सच्ची कहानी है. चार साल की ये बच्ची समंथा हॉस्टन एक अमेरिकी सीनेटर की बेटी थी, जो उसी उम्र में सीढ़ियों से गिरने पर बुरी तरह से घायल हो गई और अस्पताल में जिसकी मौत हुई. साल 1887 में उसकी पेंटिंग बनाई गई और प्रदर्शनी में लगी लेकिन आनन-फानन में उसे हटाना पड़ा. देखने वालों का कहना था कि पेंटिंग को 1 मिनट भी देखने पर उसके भाव बदलते दिखते हैं. कई लोगों ने पेंटिंग देखने के बाद उसकी तरह बच्ची को खेलता देखा.

कलाकार लौरा पी की एक तस्वीर The Stagecraft अभिशापित कहलाती है. इस पेंटिंग को कलाकार ने एक फोटोग्राफर की तस्वीर से प्रेरित होकर बनाया था. हालांकि फोटोग्राफर ने तस्वीर देखने के बाद बताया कि उसकी ली फोटो में तो गाड़ी के पास कोई आदमी खड़ा था ही नहीं. ये सच था. लेकिन लौरा ने भी खुद अपनी तस्वीर में कोई आदमी नहीं बनाया था, तब भी पेंटिंग में गाड़ी के पास एक आदमी खड़ा दिखता है. लौरा ने ये पेंटिंग एक दफ्तर में रखवाई, वहां लगातार गड़बड़ियां होने लगीं. पेपर गायब होने लगे. लगातार कई सालों तक ये हर खरीदार के साथ मुश्किलें लाती रहीं. लोग कटे सिर के आदमी को घूमता देखते. आखिरकार पेंटिंग को जलाना पड़ा.


इटली के कलाकार ब्रूनो एमेडियो ने अनाथालय के ढेरों चक्कर लगाए और वहां के बच्चों का दर्द करीब से देखा. ऐसे ही 65 रोते हुए बच्चों की ब्रूनो ने तस्वीरें बनाईं. ये दूसरे विश्व युद्ध के दौर की बात है. लाखों बच्चे कम उम्र में अनाथालय पहुंच चुके थे और एक-दूसरे की भाषा तक नहीं जानते थे. इन बच्चों की पेंटिंग्स की बाद में प्रदर्शनी लगी और वे निजी खरीददारों को बेच दी गई. इनमें से एक पेंटिंग को The Crying Boy नाम दिया गया. बाद में इसे ब्रिटेन में अभिशापित पेंटिंग के तौर पर जाना जाने लगा. इसे रखनेवालों के साथ अजीबोगरीब बातें होने लगीं. खासकर पेंटिंग के प्रिंट जहां भी होते, वहां आग लग जाती. कहा जाता था कि पेंटर ने बच्चे को रुलाने के लिए उसकी आंखों के सामने माचिस की तीली जलाई हुई थी.

इसी तरह से एक पेंटिंग The Anguished Man को दुनिया की सबसे डरावनी और भुतहा पेंटिंग कहते हैं. इसे किसने बनाया, ये किसी को नहीं पता लेकिन कलाकार ने इसे अपने या किसी के खून से बनाया था. सीन रॉबिन्सन नाम के शख्स को ये पेंटिंग अपनी मृत दादी के संदूक से मिली. इसे देखने के बाद से ही सीन के साथ हादसे होने लगे. उसे लगातार आवाजें सुनाई पड़तीं, खाली घर में अजनबी चेहरे दिखते. इसका रहस्य जानने की कई लोगों ने कोशिश की लेकिन सबके साथ कोई न कोई ऐसी डरावनी घटना हुई की वे पीछे हट गए. खुद सीन ने पेंटिंग किसी को न बेचने का निश्चय किया और उसे किसी अज्ञात जगह पर छिपा दिया. वैसे इंटरनेट पर इसके प्रिंट मिल रहे हैं लेकिन वे सेफ हैं. मुश्किल असली पेंटिंग के साथ है, जिसे अभिशप्त कहा जाता है.

Sunday, 16 August 2020

कन्हेरी गुफ़ा

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कन्हेरी गुफाएँ
(भारत के बम्बई शहर में स्थित प्राचीन गुफाएँ)

कन्हेरी गुफाएँ मुंबई शहर के पश्चिमी क्षेत्र में बसे बोरीवली के उत्तर में स्थित हैं। ये संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान  के परिसर में ही स्थित हैं और मुख्य उद्यान से ६ कि.मी. और बोरीवली स्टेशन से ७ कि.मी. दूर हैं। ये गुफाएं बौद्ध कला  को दर्शाती हैं। कन्हेरी शब्द कृष्णगिरी यानी काला पर्वत से निकला है। इन गुफाओं को बड़े बड़े बेसाल्ट की चट्टानों से तराशा गया है।
कन्हेरी का यह गिरिमंदिर मम्बई से लगभग २५ मील दूर सालसेट द्वीप पर अवस्थित पर्वत की चट्टान को काटकर बना बौद्धों का चैत्य है। हीनयान संप्रदाय का यह चैत्यमंदिर आंध्रसत्ता के प्राय: अंतिम युगों में दूसरी शती ई. के अंत में निर्मित हुआ था। यह बना प्राय: कार्ले की परंपरा में ही हैं, उसी का सा इसका चैत्य हाल है, उसी के से स्तंभों पर युगल आकृतियों इसमें भी बैठाई गई हैं। दोनों में अतंर मात्र इतना है कि कन्हेरी की कला उतनी प्राणवान्‌ और शालीन नहीं जितनी कार्ली की है। कार्ले की गुफा से इसकी गुफा कुछ छोटी भी है। फिर, लगभग एक तिहाई छोटी यह गुफा अपूर्ण भी रह गई है। इसकी बाहरी दीवारों पर जो बुद्ध की मूर्तियाँ बनी हैं, उनसे स्पष्ट है कि इसपर महायान संप्रदाय का भी बाद में प्रभाव पड़ा और हीनयान उपासना के कुछ काल बाद बौद्ध भिक्षुओं का संबंध इससे टूट गया था जो गुप्त काल  आते-आते फिर जुड़ गया, यद्यपि यह नया संबंध महायान उपासना को अपने साथ लिए आया, जो बुद्ध और बोधिसत्वों  की मूर्तियों से प्रभावित है। इन मूर्तियों में बुद्ध की एक मूर्ति २५ फुट ऊँची है।
कन्हेरी के चैत्यमंदिर का प्लान प्राय: इस प्रकार है - चतुर्दिक्‌ फैली वनसंपदा के बीच बहती जलधाराएँ, जिनके ऊपर उठती हुई पर्वत की दीवार और उसमें कटी कन्हेरी की यह गहरी लंबी गुफा। बाहर एक प्रांगण नीची दीवार से घिरा है जिसपर मूर्तियाँ बनी हैं और जिससे होकर एक सोपानमार्ग चैत्यद्वार तक जाता है। दोनों ओर द्वारपाल निर्मित हैं और चट्टानी दीवार से निकली स्तंभों की परंपरा बनती चली गई है। कुछ स्तंभ अलंकृत भी हैं। स्तंभों की संख्या ३४ है और समूची गुफा की लंबाई ८६ फुट, चौड़ाई ४० फुट और ऊँचाई ५० फुट है। स्तंभों के ऊपर की नर-नारी-मूर्तियों को कुछ लोगों ने निर्माता दंपति होने का भी अनुमान किया है जो संभवत: अनुमान मात्र ही है। कोई प्रमाण नहीं जिससे इनको इस चैत्य का निर्माता माना जाए। कन्हेरी की गणना पश्चिमी भारत के प्रधान बौद्ध गिरिमंदिरों में की जाती है और उसका वास्तु अपने द्वार, खिड़कियों तथा मेहराबों के साथ कार्ली की शिल्पपरंपरा का अनुकरण करता ह

आर्टिस्ट :- जगदम्बा देवी(मधुबनी पेंटिंग)

मिथिला कला में प्रयोग ,शैली और पहचान
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कलाओं में अधिकतर प्रयोग सप्रयास होता है और कभी कभी अनायास भी l लोककला , आधुनिक और समकालीन  सभी कलाओं में प्रयोग होते रहे हैं l आधुनिक कला आंदोलन तकनिकी क्रांति का आंदोलन भी कहा जाता है आज भी नए नए माध्यम में प्रयोग करने और कलाकृतिया रचने की प्रवृतिया देखी जाती हैं  l कलाओं में प्रयोग जरूरी भी है प्रयोग के बिना आपकी कला में एक ठहराव आ जाता है पर कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं की लोककलाओं में प्रयोग होना ही नहीं चाहिए l उनका मानना है की प्रयोग से लोककलाओं की सहजता और पारम्परिक पहचान नष्ट होती है l अब सवाल उठता है कि आखिर प्रयोग होना चाहिए या नहीं ? मेरा मानना है कि बिना प्रयोग के किसी भी कला में विकास संभव नहीं l 
आप सभी जानते हैं कि मिथिला कला में अंगूठा छाप से लेकर पढ़े लिखे दोनों तरह के कलाकारों ने श्रेष्टतम काम किया है l इन दिनों कुछ कलाकार तो आर्ट कालेज से डिग्री लेने के बाद भी पारम्परिक मिथिला पेंटिंग कर रहे हैं मगर उनकी कला में आये बदलाव को स्पष्ट पहचाना जा सकता है l किसी कलाकार की कलाकृतियों में खास अवधि, प्रशिक्षण, स्थान, "स्कूल", कला आंदोलन या पुरातात्विक संस्कृति से जुड़ाव के कारन भी बदलाव देखे जाते हैं l धीरे धीरे यही बदलाव उनकी शैली बन जाती है क्योंकि शैली कलाकार के क्रमिक विकास की प्रक्रिया है l पिकासो से लेकर गंगा देवी तक की कलाकृतियां आप किसी खास शैली में बनी होने के कारण ही आसानी से पहचान पाते हैं l
दृश्य कलाओं में शैली वह विशिष्ट तरीका है जिससे किसी कलाकार की पहचान बनतीं है l उसकी कलाकृतियों को अन्य कलाकारों की कलाकृतियों से अलग करती है l पारंपरिक और लोक कलाओं में भी कलाकारों की व्यक्तिगत शैली देखा गया है l कला बाजार के दृष्टिकोण से शैली तो विशेषज्ञों द्वारा कलाकृतियों के मूल्यांकन का प्रमुख आधार मानी जाती रही है। बाजार के धुरंधर लोग उसी विशिष्टता की ब्रांडिंग करते हैं l कला समीक्षक और शोधकर्ता भी अपने आलेखों और शोध के जरिये कलाकार की ब्रांडिंग में मदद करते हैं तभी किसी कलाकार की कलाकृति का मूल्य बाजार में बढ़ता है l आधुनिक कला पर ज्यादा लिखा जाता है तो उसका बाजार ज्यादा उछलता है वही लोककला पर कम लिखा जाता रहा है तो उसका बाजार मूल्य कम बढ़ता है l 
मिथिला कला का बाजार भी दो तरह का है l पहला आम जनता के बीच सस्ता बाजार जैसे दिल्ली हाट या सूरजकुंड जैसे मेले दूसरा बहुमूल्य कीमत पर विशिष्ट संग्रह करनेवाले उद्योगपति और धनी लोगों का विशिष्ट बाज़ार  बड़े बड़े कला दीर्घाओं में या नीलामियों में l एक ही साइज की कलाकृति कैसे विशिष्ट और बहुमूल्य हो जाती है ये बात धीरे धीरे सब गुणी कलाकार अच्छी तरह समझने लगते हैं l लीक से अलग हटकर या अपनी पारम्परिक शैली से अलग होना ही प्रयोग कहा जाता है वही प्रयोग उस कलाकार की पहचान बन जाती है l आज भी मिथिला कला के बारे में धारणा है कि ये सबसे सस्ता पेंटिंग है और सबकी पेंटिंग एक जैसी ही लगती है  जबकि कि दुनिया भर के सभी म्यूजियम और संग्रहालयों में संग्रहित है और सभी ऑक्सन में इसकी नीलामी भी होती रहती है lमिथिला कला में मुख्य चार तरह की पेंटिंग आप आसानी से पहचान सकते हैं l सिर्फ रेखांकन से बने चित्रों को कचनी,मूल रेखांकन के बाद रंगों से भरे चित्र भरनी , ज्यामितीय आकृतियों वाले तांत्रिक विषयों पर बने चित्र तांत्रिक और गोदना में उपयोग होनेवाली आकृतियों एवं राजा सलहेस की कहानी पर बने गोदना चित्रण कहा जाता है l व्यवसायिकता की वजह से आज के कलाकार सभी तरह का काम कर रहे हैं l  
 मिथिला कला से जुड़े सभी विशिष्ट कलाकारों को हम उनकी अपनी अपनी चिरपरिचित शैली के कारण ही पहचान पाते हैं l हालाँकि किसी लोक कला में मुख्य रूप से दो तरह के प्रयोग देखे जाते हैं  विषय में बदलाव और तकनिकी में बदलाव l अधिकतर  कलाकार पारम्परिक शैली में ही काम करते हुएसिर्फ अपने  विषय में बदलाव करते हैं  l पर आजकल के पढ़े लिखे चित्रकार और आर्ट कालेजों से प्रशिक्षित कलाकार तकनिकी में भी बदलाव कर रहे हैं l  यहां मैं कुछ चर्चित कलाकारों का जिक्र करना चाहूंगा जिनकी शैली आप आसानी से पहचान सकते हैं। हालांकि  आज भी कलाकारों की कलाकृतियों और उनकी शैलियों पर नहीं के बराबर लिखा जाता है ।
विषय में बदलाव की पहली उदहारण पद्मश्री गंगा देवी जिन्होंने अपने समय में पारम्परिक विषयों से अलग हटकर रोलर कोस्टर ,कैंसर के इलाज ,ट्रैन ,अमरीकी छोटे बालों वाली महिलाओं का चित्रण किया था  l
सुजनी कला के लिए चर्चित कर्पूरी देवी ने ज्यादातर पेंटिंग भरनी शैली में बनायीं l उन्होंने भी सिर्फ पारम्परिक विषयों पर चित्रण किया और  मात्र लाल और काले रंग का प्रमुखता से उपयोग किया साथ में कही कही ब्राउन रंग भी  l मनुष्य की आकृति वाले विषयों से ज्यादा इनके चित्र   आलंकारिक विषय पर होते थे जैसे अरिपन l इनकी रंग योजना और शैली का इनके परिवार के अन्य कलाकारों पर भी असर देखा जा सकता है l  
गोदावरी दत्त भी अभी तक पारम्परिक विषयों पर ही चित्रण करती रही हैं l आज के नए विषय पर चित्रण वो  पसंद नहीं करती हैं l जापान के  हासेगावा के पास उनकी सबसे बेहतरीन कलाकृति का संग्रह है जिसमे चित्र का  बैकग्राउंड खाली छोड़ा गया है l जबकि मिथिला चित्रों में अमूमन पूरा बैकग्राउं भरा भरा रहता है l इनकी आकृति में मुख्य आकर्षण अलंकरण या टेक्सचर ही है  l हालाँकि गोदावरी दत्त ने भी डेविड के कहने पर एक कलाकृति  बुद्ध के कार्निवल पर बनाया है  l
  पहली दलित महिला कलाकार यमुना देवी की सबसे  चर्चित उनकी मोटे मोटे रेखांकनों वाले चित्र ही हैं  l जबकि अधिकतर मिथिला पेंटिंग में पतली और सीधी रेखाओं वाली पेंटिंग ही बेहतर मानी गयी है l अपनी कलाकृतियों  में बिंदुओं से बनायीं गयी  रेखा का इस्तेमाल भी करती थी l 
चानो देवी मात्र गोदना कला की पहली कलाकार ही नहीं थी बल्कि  एरिका के अनुरोध पर एक गोदना कलाकार रेशमा के सहयोग से उन्होंने गोदना कला की असंख्य आकृतियों को रचा l इस अद्भुद कल्पनाशीलता के लिए उन्हें सचमुच नमन किया जाना चाहिए  l 
सीता देवी के कलाकृतियों की खास विशेषता ये थी की वे ज्यादा लम्बी और पतली आकृतियों का उपयोग करती थी और  लाल रंग का ज्यादा  उपयोग करती थी  l
भरनी शैली के ही चर्चित चित्रकार बौआ देवी के चित्र में यमुना देवी से भी मोटी काली रेखाओं का इस्तेमाल दिखाई देता है तथा अधिकतर सांप उनकी कलाकृतियों में अवश्य होता है । पद्मश्री  जगदम्बा देवी की कलाकृतियां भी अन्य कलाकारों से बिल्कुल अलग थी ।  यशोदा देवी भी अपने खास शैली में पहचानी जाती हैं ।