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Sunday, 16 August 2020

आर्टिस्ट :- जगदम्बा देवी(मधुबनी पेंटिंग)

मिथिला कला में प्रयोग ,शैली और पहचान
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कलाओं में अधिकतर प्रयोग सप्रयास होता है और कभी कभी अनायास भी l लोककला , आधुनिक और समकालीन  सभी कलाओं में प्रयोग होते रहे हैं l आधुनिक कला आंदोलन तकनिकी क्रांति का आंदोलन भी कहा जाता है आज भी नए नए माध्यम में प्रयोग करने और कलाकृतिया रचने की प्रवृतिया देखी जाती हैं  l कलाओं में प्रयोग जरूरी भी है प्रयोग के बिना आपकी कला में एक ठहराव आ जाता है पर कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं की लोककलाओं में प्रयोग होना ही नहीं चाहिए l उनका मानना है की प्रयोग से लोककलाओं की सहजता और पारम्परिक पहचान नष्ट होती है l अब सवाल उठता है कि आखिर प्रयोग होना चाहिए या नहीं ? मेरा मानना है कि बिना प्रयोग के किसी भी कला में विकास संभव नहीं l 
आप सभी जानते हैं कि मिथिला कला में अंगूठा छाप से लेकर पढ़े लिखे दोनों तरह के कलाकारों ने श्रेष्टतम काम किया है l इन दिनों कुछ कलाकार तो आर्ट कालेज से डिग्री लेने के बाद भी पारम्परिक मिथिला पेंटिंग कर रहे हैं मगर उनकी कला में आये बदलाव को स्पष्ट पहचाना जा सकता है l किसी कलाकार की कलाकृतियों में खास अवधि, प्रशिक्षण, स्थान, "स्कूल", कला आंदोलन या पुरातात्विक संस्कृति से जुड़ाव के कारन भी बदलाव देखे जाते हैं l धीरे धीरे यही बदलाव उनकी शैली बन जाती है क्योंकि शैली कलाकार के क्रमिक विकास की प्रक्रिया है l पिकासो से लेकर गंगा देवी तक की कलाकृतियां आप किसी खास शैली में बनी होने के कारण ही आसानी से पहचान पाते हैं l
दृश्य कलाओं में शैली वह विशिष्ट तरीका है जिससे किसी कलाकार की पहचान बनतीं है l उसकी कलाकृतियों को अन्य कलाकारों की कलाकृतियों से अलग करती है l पारंपरिक और लोक कलाओं में भी कलाकारों की व्यक्तिगत शैली देखा गया है l कला बाजार के दृष्टिकोण से शैली तो विशेषज्ञों द्वारा कलाकृतियों के मूल्यांकन का प्रमुख आधार मानी जाती रही है। बाजार के धुरंधर लोग उसी विशिष्टता की ब्रांडिंग करते हैं l कला समीक्षक और शोधकर्ता भी अपने आलेखों और शोध के जरिये कलाकार की ब्रांडिंग में मदद करते हैं तभी किसी कलाकार की कलाकृति का मूल्य बाजार में बढ़ता है l आधुनिक कला पर ज्यादा लिखा जाता है तो उसका बाजार ज्यादा उछलता है वही लोककला पर कम लिखा जाता रहा है तो उसका बाजार मूल्य कम बढ़ता है l 
मिथिला कला का बाजार भी दो तरह का है l पहला आम जनता के बीच सस्ता बाजार जैसे दिल्ली हाट या सूरजकुंड जैसे मेले दूसरा बहुमूल्य कीमत पर विशिष्ट संग्रह करनेवाले उद्योगपति और धनी लोगों का विशिष्ट बाज़ार  बड़े बड़े कला दीर्घाओं में या नीलामियों में l एक ही साइज की कलाकृति कैसे विशिष्ट और बहुमूल्य हो जाती है ये बात धीरे धीरे सब गुणी कलाकार अच्छी तरह समझने लगते हैं l लीक से अलग हटकर या अपनी पारम्परिक शैली से अलग होना ही प्रयोग कहा जाता है वही प्रयोग उस कलाकार की पहचान बन जाती है l आज भी मिथिला कला के बारे में धारणा है कि ये सबसे सस्ता पेंटिंग है और सबकी पेंटिंग एक जैसी ही लगती है  जबकि कि दुनिया भर के सभी म्यूजियम और संग्रहालयों में संग्रहित है और सभी ऑक्सन में इसकी नीलामी भी होती रहती है lमिथिला कला में मुख्य चार तरह की पेंटिंग आप आसानी से पहचान सकते हैं l सिर्फ रेखांकन से बने चित्रों को कचनी,मूल रेखांकन के बाद रंगों से भरे चित्र भरनी , ज्यामितीय आकृतियों वाले तांत्रिक विषयों पर बने चित्र तांत्रिक और गोदना में उपयोग होनेवाली आकृतियों एवं राजा सलहेस की कहानी पर बने गोदना चित्रण कहा जाता है l व्यवसायिकता की वजह से आज के कलाकार सभी तरह का काम कर रहे हैं l  
 मिथिला कला से जुड़े सभी विशिष्ट कलाकारों को हम उनकी अपनी अपनी चिरपरिचित शैली के कारण ही पहचान पाते हैं l हालाँकि किसी लोक कला में मुख्य रूप से दो तरह के प्रयोग देखे जाते हैं  विषय में बदलाव और तकनिकी में बदलाव l अधिकतर  कलाकार पारम्परिक शैली में ही काम करते हुएसिर्फ अपने  विषय में बदलाव करते हैं  l पर आजकल के पढ़े लिखे चित्रकार और आर्ट कालेजों से प्रशिक्षित कलाकार तकनिकी में भी बदलाव कर रहे हैं l  यहां मैं कुछ चर्चित कलाकारों का जिक्र करना चाहूंगा जिनकी शैली आप आसानी से पहचान सकते हैं। हालांकि  आज भी कलाकारों की कलाकृतियों और उनकी शैलियों पर नहीं के बराबर लिखा जाता है ।
विषय में बदलाव की पहली उदहारण पद्मश्री गंगा देवी जिन्होंने अपने समय में पारम्परिक विषयों से अलग हटकर रोलर कोस्टर ,कैंसर के इलाज ,ट्रैन ,अमरीकी छोटे बालों वाली महिलाओं का चित्रण किया था  l
सुजनी कला के लिए चर्चित कर्पूरी देवी ने ज्यादातर पेंटिंग भरनी शैली में बनायीं l उन्होंने भी सिर्फ पारम्परिक विषयों पर चित्रण किया और  मात्र लाल और काले रंग का प्रमुखता से उपयोग किया साथ में कही कही ब्राउन रंग भी  l मनुष्य की आकृति वाले विषयों से ज्यादा इनके चित्र   आलंकारिक विषय पर होते थे जैसे अरिपन l इनकी रंग योजना और शैली का इनके परिवार के अन्य कलाकारों पर भी असर देखा जा सकता है l  
गोदावरी दत्त भी अभी तक पारम्परिक विषयों पर ही चित्रण करती रही हैं l आज के नए विषय पर चित्रण वो  पसंद नहीं करती हैं l जापान के  हासेगावा के पास उनकी सबसे बेहतरीन कलाकृति का संग्रह है जिसमे चित्र का  बैकग्राउंड खाली छोड़ा गया है l जबकि मिथिला चित्रों में अमूमन पूरा बैकग्राउं भरा भरा रहता है l इनकी आकृति में मुख्य आकर्षण अलंकरण या टेक्सचर ही है  l हालाँकि गोदावरी दत्त ने भी डेविड के कहने पर एक कलाकृति  बुद्ध के कार्निवल पर बनाया है  l
  पहली दलित महिला कलाकार यमुना देवी की सबसे  चर्चित उनकी मोटे मोटे रेखांकनों वाले चित्र ही हैं  l जबकि अधिकतर मिथिला पेंटिंग में पतली और सीधी रेखाओं वाली पेंटिंग ही बेहतर मानी गयी है l अपनी कलाकृतियों  में बिंदुओं से बनायीं गयी  रेखा का इस्तेमाल भी करती थी l 
चानो देवी मात्र गोदना कला की पहली कलाकार ही नहीं थी बल्कि  एरिका के अनुरोध पर एक गोदना कलाकार रेशमा के सहयोग से उन्होंने गोदना कला की असंख्य आकृतियों को रचा l इस अद्भुद कल्पनाशीलता के लिए उन्हें सचमुच नमन किया जाना चाहिए  l 
सीता देवी के कलाकृतियों की खास विशेषता ये थी की वे ज्यादा लम्बी और पतली आकृतियों का उपयोग करती थी और  लाल रंग का ज्यादा  उपयोग करती थी  l
भरनी शैली के ही चर्चित चित्रकार बौआ देवी के चित्र में यमुना देवी से भी मोटी काली रेखाओं का इस्तेमाल दिखाई देता है तथा अधिकतर सांप उनकी कलाकृतियों में अवश्य होता है । पद्मश्री  जगदम्बा देवी की कलाकृतियां भी अन्य कलाकारों से बिल्कुल अलग थी ।  यशोदा देवी भी अपने खास शैली में पहचानी जाती हैं ।

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