Friday, 5 June 2020
सूर्य देव मंदिर का महत्व
भारत में सूर्य देव की उपासना ऋग वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना का उल्लेख विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से है। उत्तर वैदिक काल के अन्तिम कालखण्ड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने के बाद कालान्तर में सूर्य की मूर्ति पूजा का प्रचलन हो गया और अनेक स्थानों पर सूर्यदेव के मन्दिर बनाये गये। कश्मीर के दक्षिणी भाग में श्रीनगर से 60 किलोमीटर दूर अनंतनाग से पहलगाम के रास्ते में मार्तण्ड सूर्य मन्दिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में कर्कोटक वंश के राजा ललितादित्य मुक्तापीड ने करवाया था। मन्दिर के स्तम्भों की वास्तु-शैली रोम की डोरिक शैली से मिलती-जुलती है। बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि में इस मन्दिर को बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है। वर्तमान में यह मन्दिर खंडहरों में तब्दील हो चुका है पर आज भी सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। यह कश्मीरी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है, जिसमें चीनी, रोमन, ग्रीक और भारतीय शैली की झलक दिखती है। दक्षिण कश्मीर के मार्तण्ड के प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर के प्रतिरूप का सूर्य मन्दिर जम्मू में भी बनाया गया है। आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में अरसावल्ली गाँव में प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर का निर्माण कलिंग राजवंश के राजा देवेन्द्र वर्मा ने 7वीं सदी में करवाया था। दक्षिण भारतीय और कलिंग स्थापत्य शैली का यह मन्दिर दक्षिण भारत में एकमात्र सूर्य मन्दिर है। मन्दिर का निर्माण इस तरह किया गया है कि वर्ष में दो बार (मार्च और अक्टूबर) मे प्रातः काल सूर्य की सुनहरी किरणे भगवान सूर्य की मूर्ति के चरणो में पड़े। सूर्य की किरणें मन्दिर के 5 मुख्य द्वारो से होकर काले ग्रेनाइट से बने सूर्यदेव के चरणो तक पहुंचती हैं। सूर्य देव को त्रिमूर्ति -ब्रह्मा,विष्णु और महेश तीनो ही का स्वरुप माना जाता है, इसी लिये इस मन्दिर में आदित्य, अम्बिका, विष्णु, गणेश और महेश्वर की मूर्तियां स्थापित है। इस मन्दिर को श्री सूर्यनरायण स्वामी देवस्थान और हर्षवल्ली अर्थात खुशियों का घर भी कहते है। उत्तराखण्ड राज्य में अल्मोड़ा से लगभग 17 किलोमीटर दूर कटारमल में स्थित कटारमल सूर्य मन्दिर का निर्माण कत्यूरी राजवंश के शासक कटारमल के द्वारा तेरहवीं शताब्दी में हुआ था। इस सूर्य मन्दिर को "बड़ आदित्य सूर्य मन्दिर" भी कहा जाता है क्योंकि इस मन्दिर में भगवान आदित्य की मूर्ति किसी पत्थर अथवा धातु की नहीं अपितु बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। यह पूर्वाभिमुखी मन्दिर 2,116 मीटर की ऊंचाई पर त्रिरथ संरचना और वर्गाकार गर्भगृह के साथ वक्ररेखी शिखर सहित निर्मित है। एक ऊँचे वर्गाकार चबूतरे पर सूर्यदेव को समर्पित मुख्य मन्दिर के आस-पास 45 छोटे-बड़े मन्दिरों का समूह भी है। मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार बेजोड़ काष्ठ कला द्वारा उत्कीर्ण था, जो कुछ अन्य अवशेषों के साथ वर्तमान में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित है। राजस्थान के झालावाड़ जिले में झालरापाटन के सूर्य मन्दिर का निर्माण नाग भट्ट द्वितीय ने 9वीं सदी में करवाया था। रथ शैली में बने इस मन्दिर के गर्भगृह में चतुर्भज नारायण की मूर्ति प्रतिष्ठित हैं। पुराणों में सूर्य की उपासना चतुर्भुज नारायण के रूप में भी की गई हैं। इस मन्दिर को पद्मनाभ मन्दिर, बड़ा मन्दिर, सात सहेलियों के मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। ओडिशा राज्य मे पुरी के निकट कोणार्क सूर्य मन्दिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने 13वीं शताब्दी में करवाया था। रथ के आकार में बनाया गया यह मन्दिर भारत की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा उदाहरण है। यहां रथ के आकार में बना एक भव्य भवन है; मन्दिर के दोनों और 12 पहियों की दो कतारों में इसके 24 पहिए एक दिन में 24 घण्टों का प्रतीक है और रथ खींच रहे सात अश्व सप्ताह के सात दिन दर्शाते हैं। यहां की सूर्य प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में सुरक्षित रखी गई है और अब यहां कोई देव मूर्ति नहीं है। इसमें काले रंग के ग्रेनाइट पत्यर का प्रयोग होने के कारण इसे "ब्लैक पगोडा" भी कहते है। इस मन्दिर को यूनेस्को द्वारा वर्ष 1984 में विश्व विरासत घोषित किया गया है। गुजरात के मेहसाणा जिले में पुष्पावती नदी के किनारे स्थित मोढेरा सूर्य मन्दिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। भारत के मध्य से गुजरती कर्क रेखा के ऊपर स्थापित इस मन्दिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूरे मन्दिर के निर्माण में जुड़ाई के लिए कहीं भी चूने का उपयोग नहीं किया गया है। ईरानी शैली में निर्मित इस मन्दिर को दो हिस्सों - गर्भगृह और सभामंडप में बनाया गया है। मोढेरा सूर्य मन्दिर के अष्टभुजीय सभामंडप में एक सौर वर्ष के 52 सप्ताहों को दर्शाते 52 स्तम्भ हैं। इन स्तम्भों पर विभिन्न देवी-देवताओं के चित्रों के अलावा रामायण और महाभारत के प्रसंगों को बेहतरीन कारीगरी के साथ दिखाया गया है। वर्तमान में इस मन्दिर के भीतर किसी भी देवी अथवा देवता की प्रतिमा उपस्थित नहीं है।
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