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Sunday, 23 October 2022

रसों के भाव व उसके वर्ण

रसों के भाव व उसके वर्ण 

     रस                    भाव                       वर्ण 
1. शृंगार                  रति                    श्याम ( काला )

2. हास्य                   हास                   श्वेत ( सफेद)

3. करुण                  शोक                  काला 

4. वीर                     उत्साह                स्वर्ण/गौर 

5. रौद्र                     क्रोध                   लाल

6. भयानक               भय                    काला 

7. वीभत्स              जुगुप्सा (घृणा)        नीला 

8. अद्भुत               विस्मय/ आश्चर्य        पीला 

9. शांत                     निर्वेद                  सफेद 


● आकृति के मनोभावों   स्वभाव एवं व्यंगात्मक प्रकिया को भाव कहते हैं। 
●स्थायी भाव से रस का जन्म होता हे | जो भावना स्थिर और सार्वभौम होती है उसे स्थायी भाव कहते हैं। विभाव अनुभव और व्यभिचार स्थायी भावों का अधीन होते हैं। इसीलिए स्थायी भाव मुख्य बनता है। स्थायी भाव भावनाओं से बनता है और व्यभिचार एंसिलरी होती हे | जब स्थायी व्यभिचारी विभाव और अनुभव से संयोजन होता है तब रस बनता हे | नाट्यशास्त्र में कहते हैं कि " एक अच्छा स्वाद का उत्पादन किया जाता है जब विभिन्न मसाले एक साथ मिलाते हे, वैसे ही स्थायी भाव से रस का स्वाद बढ़ता हे |"

यह गौर का बात हे की भाव भावुकता के उत्पादन में एक मुख भाग करता है। रस का उत्पादन भाव के बिना नहीं हो सकता | इस प्रकार से स्थायी भाव, रस के नाम से प्रसिद्ध हे | स्थायी भाव ८ होता हे

रति (प्रेम)उत्साह (ऊर्जा)शोकहासविसम्याभयजुगुप्साक्रोधआश्चर्यनिर्वेद

कुछ लोग ' सम' भी इसके साथ जोड़ते हे |

●जब वे खराब होते हैं, तो वे इसे किस प्रकार के ध्वनिक होते हैं ये मन के भाव के रूप में व्यक्त करते हैं।
संस्कृत के वाक्य काव्य की परिभाषा है। "वाक्यं रस डिस्ट्रक्टिवं काव्यं" रस से टाइट वाक्य काव्य हैं। रस को काव्य ।

उदाहरण– भज चरण चरण अवनासी ।
जेताई दीसे धरण गगन बिच, तेताई सब उठती जासी।

● रस की निंदा-

हृदय में स्थिति परिवर्तन का प्रभाव, विभाव्यता और संवेदन भाव से I
– "राम को रूप निहारति जानकी, सूरी के नाग की परिछांही। याते सबै सुधि उदाहरण, टेक पल कोपोर्ट नहीं"

                                                                                                    इसलिए इसलिए कि
स्थायी भाव - रति
2.
रही रही रही रही रही रही रही रही रही रही रहीं वैभावी रही बोली लगी हुई जानती की (आश्राय) राम (विषय)
उददीपन के नग में (प्रिय का) प्रतिरूप
3 अनुभाव - कर टेकना, पली गिरना।
4. संप्रेषण भाव - हर्ष, जड़ता, अवज्ञात
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